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प्राइमरी टीचर के लिए डीएड की जगह बीएड डिग्री मान्य नहीं, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में नियुक्ति की याचिका खारिज

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने संविदा शाला शिक्षक ग्रेड-3 भर्ती को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों के लिए अनिवार्य डीएड योग्यता की जगह बीएड डिग्री को नहीं माना जा सकता।

जबलपुर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति साफ की है। अदालत ने संविदा शाला शिक्षक ग्रेड-III (वर्ग-3) के पद पर नियुक्ति की मांग करने वाली एक याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि प्राथमिक स्कूल के शिक्षकों के लिए तय DEd योग्यता की जगह BEd की डिग्री को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता सुधा गुप्ता द्वारा दायर उस याचिका को सिरे से नामंजूर कर दिया, जिसमें उन्होंने साल 2011 की पात्रता परीक्षा के आधार पर नियुक्ति की गुहार लगाई थी।

मेरिट लिस्ट में नाम होने से नहीं मिलता नियुक्ति का अधिकार

याचिकाकर्ता सुधा गुप्ता ने साल 2011 में आयोजित संविदा शाला शिक्षक वर्ग-3 की पात्रता परीक्षा पास की थी। उन्होंने अदालत में तर्क दिया था कि उनके जैसे ही कई अन्य उम्मीदवारों को पिछले मामलों में राहत देते हुए नियुक्तियां दी गई हैं, इसलिए उन्हें भी पद मिलना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने मध्य प्रदेश पंचायत अध्यापक कैडर नियमों का हवाला देते हुए पाया कि याचिकाकर्ता के पास बीएड की उच्च डिग्री तो है, लेकिन प्राथमिक स्तर के लिए अनिवार्य डीएड या डीएलएड की योग्यता नहीं है।

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करना या मेरिट लिस्ट में जगह पा लेना ही नौकरी की गारंटी नहीं बन जाता।
नियुक्ति पाने के लिए संबंधित पद के लिए सरकार द्वारा तय किए गए विशिष्ट शैक्षणिक नियमों और अहर्ताओं को पूरा करना बेहद जरूरी है।
फैसले में कहा गया कि बीएड का कोर्स मुख्य रूप से अपर प्राइमरी, सेकेंडरी और सीनियर सेकेंडरी कक्षाओं के छात्रों को पढ़ाने के लिए तैयार किया जाता है।
इसके विपरीत, डीएड और डीएलएड जैसे पाठ्यक्रम विशेष रूप से प्राथमिक यानी शुरुआती स्तर के बच्चों को पढ़ाने की कला सिखाने के लिए डिजाइन किए जाते हैं।

दोनों डिग्री के शैक्षणिक उद्देश्य और प्रशिक्षण बिल्कुल अलग

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि दोनों ही शैक्षणिक डिग्रियों के उद्देश्य और उनके प्रशिक्षण की प्रकृति में बड़ा अंतर है। प्राथमिक स्तर के छोटे बच्चों की मानसिकता को समझने और उन्हें बुनियादी शिक्षा देने के लिए डीएड स्तर के विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, जिसे सेकेंडरी स्तर के बीएड कोर्स से नहीं बदला जा सकता। अदालत के इस सख्त रुख के बाद राज्य में चल रही अन्य शिक्षक भर्तियों में भी योग्यता संबंधी नियमों को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो गई है।

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