[कोलकाता ब्यूरो | महानगर मेट्रो विशेष रिपोर्ट]
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का विधानसभा चुनाव महज सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि विचारधाराओं और अस्मिता की एक ऐसी जंग बन चुका है जिसकी गूँज दिल्ली के गलियारों तक सुनाई दे रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ‘तृणमूल कांग्रेस’ के 15 साल के शासन को उखाड़ फेंकने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस बार ‘साम, दाम, दंड, भेद’ की अपनी सबसे आक्रामक रणनीति तैनात की है।
- भाजपा का ‘बी-टीम’ दांव: वोटों के ध्रुवीकरण की नई बिसात
बंगाल की राजनीति में इस बार सबसे बड़ा चर्चा का विषय है—’बी-टीम’ का उदय। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी के पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए भाजपा ने परोक्ष रूप से एक मोर्चा तैयार किया है।
- त्रिकोणीय गठबंधन: पूर्व टीएमसी नेता हुमायूं कबीर की ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ (AJUP), वामपंथी दल (Left Front) और असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM का एक साथ आना दीदी के लिए खतरे की घंटी है।
- गणित का खेल: यदि मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में मुस्लिम वोटों का 10-15% हिस्सा भी इस मोर्चे की तरफ मुड़ता है, तो इसका सीधा लाभ भाजपा को उन सीटों पर मिलेगा जहाँ जीत का अंतर कम रहता है। टीएमसी इसे ‘बीजेपी की साजिश’ करार दे रही है, जबकि विपक्ष इसे ‘जनता का विकल्प’ बता रहा है।
- मोदी-शाह की ‘चुनावी सुनामी’ और हिंदुत्व का कार्ड
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की रैलियों ने बंगाल के सुदूर गाँवों तक केसरिया लहर पहुँचाने का प्रयास किया है।
- आक्रामक मुद्दे: संदेशखाली की घटनाएं, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का क्रियान्वयन और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को भाजपा ने अपना मुख्य हथियार बनाया है।
- रणनीति: भाजपा इस बार केवल रैलियों तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘पन्ना प्रमुख’ स्तर पर माइक्रो-मैनेजमेंट कर रही है। अमित शाह का लक्ष्य स्पष्ट है—’अस्ली पोरिबोर्तन’ के जरिए कोलकाता के राइटर्स बिल्डिंग पर भगवा फहराना।
- ममता की ’10 प्रतिज्ञाएं’ बनाम ‘दीदी का भरोसा’
तमाम घेराबंदी के बावजूद ममता बनर्जी ने हार नहीं मानी है। उन्होंने अपने मेनिफेस्टो को एक ‘प्रोग्रेस रिपोर्ट’ की तरह पेश किया है।
- कल्याणकारी योजनाओं का सुरक्षा कवच: ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना के तहत महिलाओं को मिलने वाली नकद सहायता ममता का सबसे बड़ा ‘साइलेंट वोटर’ बैंक है।
- बंगाल की बेटी कार्ड: ममता ने एक बार फिर बाहरी बनाम भीतरी का नैरेटिव सेट किया है। उनका तर्क है कि भाजपा बंगाल की संस्कृति और पहचान को नष्ट करना चाहती है। सवाल यह है कि क्या मतदाता इस भावनात्मक अपील से फिर प्रभावित होगा?
- भ्रष्टाचार और बेरोजगारी: भाजपा का तीखा प्रहार
बीजेपी का आरोप है कि टीएमसी सरकार सत्ता के लालच में किसी भी हद तक गिर सकती है। शिक्षक भर्ती घोटाला और राशन घोटाले जैसे मुद्दों को लेकर भाजपा ने युवा मतदाताओं को साधने की कोशिश की है। वहीं, टीएमसी का पलटवार है कि केंद्र सरकार केंद्रीय एजेंसियों (ED/CBI) का दुरुपयोग कर विपक्षी नेताओं को डरा रही है।
प्रमुख चुनावी समीकरण: एक विस्तृत विश्लेषण
| चुनावी कारक | टीएमसी की स्थिति | भाजपा की स्थिति |
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| महिला मतदाता | ‘लक्ष्मी भंडार’ के कारण मजबूत पकड़। | सुरक्षा और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सेंधमारी। |
| युवा वर्ग | ‘युवा साथी’ भत्ता और नए रोजगार के वादे। | ‘बेरोजगारी’ और ‘सिंडिकेट राज’ पर कड़ा प्रहार। |
| अल्पसंख्यक वोट | फूट का खतरा (AJUP-AIMIM गठबंधन से)। | ध्रुवीकरण के जरिए बहुसंख्यक वोटों का एकीकरण। |
| संगठनात्मक शक्ति | जमीनी स्तर पर मजबूत लेकिन गुटबाजी हावी। | आरएसएस (RSS) के कैडर और केंद्रीय नेतृत्व का बल। |
निष्कर्ष: क्या होगा ‘खेला 2.0’?
सवाल यह नहीं है कि कौन कितनी रैलियां कर रहा है, सवाल यह है कि बंगाल का खामोश मतदाता किसके पक्ष में ‘ईवीएम’ का बटन दबाएगा। क्या ममता बनर्जी अपने मेनिफेस्टो और काम के दम पर अपना किला बचा पाएंगी? या भाजपा की ‘बी-टीम’ और मोदी-शाह की रणनीति इस बार ‘खेला’ कर जाएगी?
सत्ता के लालच और लोकतंत्र के इस महाकुंभ में जीत उसी की होगी जो बंगाल की नब्ज को सही तरीके से पकड़ पाएगा। 4 मई के परिणाम तय करेंगे कि सोनार बांग्ला का भविष्य किस दिशा में जाएगा।
— विशेष प्रस्तुति: ‘महानगर मेट्रो’ न्यूज़ डेस्क

