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विशेष लेख: महानगर मेट्रो एक्सक्लूसिवहेडलाइन: पत्रकार या एंकर? तथ्य और राय के बीच धुंधली पड़ती सीमा: लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में आई दरार का सच

अहमदाबाद:
आज के डिजिटल युग में हम चारों ओर से सूचनाओं और ख़बरों से घिरे हुए हैं। लेकिन क्या हम वाकई ‘समाचार’ देख रहे हैं या किसी की व्यक्तिगत ‘राय’ (Opinion)? ‘पक्કો गुजरात’ आज एक ऐसे विषय पर प्रकाश डालने जा रहा है जो सीधे तौर पर हमारे लोकतंत्र की नींव से जुड़ा है। पत्रकार और एंकर के बीच का अंतर अब केवल पेशे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह ‘सत्य’ और ‘सनसनी’ के बीच का युद्ध बन गया है।
पत्रकार कौन है? – तथ्यों का सजग प्रहरी
एक वास्तविक पत्रकार वह है जिसका कार्यक्षेत्र सड़क पर है, फाइलों के भीतर है और निरंतर सत्य की खोज में है। पत्रकारिता का मूल धर्म है:

  • तथ्यों का संकलन: बिना प्रमाण के कोई बात न कहना।
  • निष्पक्षता: सत्ता किसी की भी हो, निर्ભय होकर सवाल पूछना ही उसकी निष्ठा है।
  • चौथा स्तंभ: कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की गतिविधियों पर पैनी नजर रखना।
    एंकर का बदलता स्वरूप: सूत्रधार या कमेंटेटर?
    मूल रूप से एंकर का अर्थ समाचार प्रस्तुत करने वाला वह ‘सूत्रधार’ है, जो जटिल विवरणों को सरल बनाकर दर्शकों तक पहुँचाता है। लेकिन आज स्थिति बदल गई है। टीवी स्टूडियो में बैठकर चिल्लाने वाले और खुद ही ‘न्यायाधीश’ बन जाने वाले एंकर अब केवल ‘कमेंटेटर’ बनकर रह गए हैं। वे समाचार नहीं देते, बल्कि अपना ‘एजेंडा’ समाचार के रूप में परोसते हैं।

अंतर समझें: पत्रकार तथ्य (Fact) पेश करता है, जबकि आज के कई एंकर केवल अपनी राय (Opinion) थोपते हैं।

‘जहरीले एंकर’ और लोकतंत्र पर मंडराता खतरा
आज मीडिया में एक ऐसा वर्ग खड़ा हो गया है जिसे ‘विषाक्त’ या ‘जहरीला एंकर’ कहा जा सकता है। इनकी पहचान क्या है?

  • चिल्लाना: तथ्यों की कमी होने पर अपनी आवाज को ऊँचा करना।
  • सत्ता की भक्ति: प्रश्न पूछने के बजाय सत्ता की ढाल बनना।
  • अनुचित लेबलिंग: विरोध करने वाले या सवाल पूछने वाले को ‘देशद्रोही’ या ‘उपद्रवी’ करार देना।
  • संविधान विरोधी मानसिकता: खाप पंचायतों जैसी कुप्रथाओं का समर्थन करना या महिलाओं की आजादी पर अभद्र टिप्पणी करना पत्रकारिता का पतन है।
    आर्थिक असमानता: एक कड़वा सच
    सबसे चौंकाने वाला पहलू आर्थिक है। वह पत्रकार जो मैदान में उतरकर धूप और बारिश में तथ्य जुटाता है, उसका औसत वेतन मात्र ₹10,000 से ₹15,000 है। इसके विपरीत, स्टूडियो में बैठकर केवल कमेंट्री करने वाले एंकर लाखों-करोड़ों में कमा रहे हैं। इस भारी असमानता के कारण वास्तविक पत्रकारिता दम तोड़ रही है।
    हमारा समाधान: (दर्शकों के लिए मार्गदर्शिका)
    यदि हमें लोकतंत्र को बचाना है, तो ये कदम उठाना अनिवार्य है:
  • मीडिया साक्षरता: समाचार और कमेंट्री (राय) के बीच के अंतर को पहचानें।
  • बहिष्कार: जो एंकर चिल्लाए या उकसाने वाली बातें करे, उस चैनल को देखना बंद करें।
  • समर्थन: निष्पक्ष पत्रकारों और स्वतंत्र मीडिया संस्थानों को आर्थिक और नैतिक सहयोग दें।
  • प्रश्न पूछें: खुद से पूछें कि क्या यह खबर है या किसी का निजी एजेंडा?
    निष्कर्ष
    पत्रकार तथ्यों का अन्वेषक है, जबकि एंकर मात्र एक माध्यम। जब माध्यम खुद ही ‘सत्य’ होने का दावा करने लगे, तब लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। अंधभक्ति लोकतंत्र को खोखला कर देती है, लेकिन सच्ची पत्रकारिता उसे जीवित रखती है। ‘पक्કો ગુજરાત’ की ओर से हम ऐसी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं जो सत्ता से सवाल कर सके और जनता को जागरूक रख सके।
    लेखन: पवन माकन
    सौजन्य: महानगर मेट्रो
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