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सूरत के नसीरनगर तोड़फोड़ विवाद में प्रशासन की नाकामी : सवालों से बचने के लिए अधिकारी पुलिस को आगे लाए? पत्रकारों के सामने प्रशासन चुप क्यों है?

महानगर मेट्रो न्यूज़ के ‘मुद्दानी वात’ प्रोग्राम में पवन माकन के तीखे और जानलेवा सवाल; क्या ज़िम्मेदारी तय होगी या जांच के नाम पर सिर्फ़ लीपापोती की जाएगी?

सूरत। सूरत का नसीरनगर तोड़फोड़ अब सिर्फ़ मलबा हटाने का मामला नहीं रहा, बल्कि भ्रष्टाचार, नाकाबिलियत और पावर के गलत इस्तेमाल की ऐसी भयानक उलझन बन गया है जिसमें प्रशासन के बड़े अधिकारी बुरी तरह उलझे हुए हैं। आज जब गरीबों की रोजी-रोटी पर बुलडोजर चलाने वाला प्रशासन जनता और मीडिया के सवालों के कटघरे में खड़ा है, तो उसके पास कहने के लिए एक भी शब्द नहीं है। सवालों का सही जवाब देने के बजाय, अधिकारी पत्रकारों के सामने पुलिस की ढाल को आगे ले आए हैं, जिससे साबित होता है कि दाल में कुछ भी काला नहीं है, पूरी दाल ही काली है!

‘मुद्दनी वात’ में पवन माकन के तीखे और सीधे सवाल

इस गंभीर और ज्वलंत मुद्दे पर सीनियर पत्रकार पवन माकन ने महानगर मेट्रो के पॉपुलर प्रोग्राम ‘मुद्दनी वात’ में सीधे, जानलेवा और तीखे सवाल पूछे हैं जो सिस्टम की शान को उसकी जगह पर ला देंगे। पवन माकन ने न्यूज़ रूम से गरजकर सत्ता के नशे में चूर अधिकारियों की नींद उड़ा दी है:

डिमोलिशन किसने किया? क्या पूरा प्रोसेस कानूनी नियमों के हिसाब से हुआ या किसी के पर्सनल फायदे या दबाव में बुलडोजर चलाया गया?

मंज़ूरी किसने दी? कागज़ पर इस डेमोलिशन का ऑर्डर देने वाला असली चेहरा कौन है? उस अधिकारी पर कोई उंगली क्यों नहीं उठा रहा है?

मौके पर कौन से अधिकारी मौजूद थे? जब गरीब रो रहे थे, तो कौन से ज़िम्मेदार अधिकारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर वहां खड़े होकर तमाशा देख रहे थे? पत्रकारों के प्रति प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी

जब भी ‘महानगर मेट्रो न्यूज़’ टीम ने इन सवालों के जवाब जानने के लिए संबंधित विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया, तो अधिकारी या तो चैंबर से भागते
दिखे या पत्रकारों के माइक्रोफोन देखकर चुप हो गए। सवाल यह उठता है कि अगर प्रशासन सही है, तो पत्रकारों के सवालों का सामना करने में इतनी परेशानी क्यों है? मीडिया को रोकने के लिए पुलिस बल का गलत इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है?

क्या ज़िम्मेदारी तय होगी या यह सिर्फ़ ‘जांच’ का एक और नाटक है?

गुजरात के लोग अब प्रशासन के पुराने बहानों से तंग आ चुके हैं जिसमें हर घोटाले या विवाद के बाद कहा जाता है कि ‘एक कमेटी बनाकर जांच की जाएगी’। क्या इस नसीरनगर विवाद में असली दोषी अधिकारियों की ज़िम्मेदारी तय होगी? क्या आपराधिक लापरवाही दिखाने वाले अधिकारी सलाखों के पीछे जाएंगे या हर बार की तरह फाइलें दबाकर पूरे मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा?

जनता के सवाल, प्रशासन से जवाब का इंतज़ार…

सूरत के लोग और विस्थापित परिवार आज न्याय की भीख मांग रहे हैं। ‘महानगर मेट्रो’ इस पूरे विवाद की जड़ तक पहुंचने के लिए पक्का इरादा रखता है। पवन माकन और हमारी पूरी टीम तब तक सवाल पूछती रहेगी जब तक AC केबिन में बैठे भ्रष्ट अधिकारी जनता को सही जवाब नहीं दे देते।

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