सोशल मीडिया की अफवाहों के खिलाफ अभय चोपड़ा का शंखनाद, ‘जगत’ की कार्यप्रणाली पर उठाए गंभीर सवाल
नागदा शहर की फिजाओं में इन दिनों एक अजीब सी बेचैनी है। कभी अपनी शांति, व्यापार और सद्भाव के लिए पहचाना जाने वाला स्थानीय जैन समाज आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां असल जिंदगी के रिश्ते सोशल मीडिया की आभासी दुनिया के दांवपेंच में उलझकर रह गए हैं। यह विवाद अब बंद कमरों की फुसफुसाहट से बाहर निकलकर फेसबुक और व्हाट्सएप की चौपालों पर खुलेआम लड़ा जा रहा है। इसी खींचतान के बीच नागदा के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता अभय चोपड़ा ने मोर्चा संभालते हुए ‘जगत’ नामक व्यक्ति पर सीधा और बेहद तीखा प्रहार किया है। उनका यह हमला सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उस पूरी प्रवृत्ति पर है जो बिना तथ्यों के समाज में भ्रम का जहर घोल रही है।
अभय चोपड़ा ने अपने सार्वजनिक बयान में दो टूक लहजे में कहा कि आज के दौर में कुछ लोग सोशल मीडिया को अपनी निजी जागीर समझ बैठे हैं। बिना किसी सिर-पैर और पुख्ता सबूतों के मनगढ़ंत कहानियां गढ़ना अब एक शगल बन गया है। इस पूरे विवाद पर तंज कसते हुए चोपड़ा ने कहा, मैंने पहले भी फोन पर स्पष्ट किया था और आज फिर कह रहा हूं कि मैं एक लॉ ग्रेजुएट (कानून स्नातक) हूं। मैं तथ्यों, सबूतों और तर्कों पर बात करता हूं, जबकि आपकी हरकतें किसी चौथी-पांचवीं कक्षा के नादान छात्र जैसी प्रतीत होती हैं। ऐसा लगता है कि बचपन में आपने जासूसी उपन्यास कुछ ज्यादा ही पढ़ लिए हैं, और अब उसी कल्पना की दुनिया में जी रहे हैं। आपको नींद में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में सोशल मीडिया पर रोज नए सपने आते हैं, जिन्हें आप सच मानकर समाज के सामने परोस देते हैं।
विवाद की असली जड़ यानी गच्छ विवाद और करोड़ों रुपये के तथाकथित दावों की परतों को उधेड़ते हुए चोपड़ा ने पूरी स्थिति को स्पष्ट किया। उन्होंने मजबूती से अपनी बात रखते हुए कहा कि उनका संगठन ‘अखिल भारतीय हिंदू जैन साधु संत रक्षा समिति’ शीशे की तरह पूरी तरह पारदर्शी है और समाज हित के लिए समर्पित है। उन्होंने जगत की कार्यप्रणाली पर सीधा निशाना साधते हुए एक पुरानी कहावत का जिक्र किया कि सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है और चोरों को सब जगह चोर ही नजर आते हैं। जो लोग समाज के नाम पर करोड़ों रुपये ऐंठने के सुनहरे सपने देख रहे थे, उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया गया है, शायद यही उनकी असली बौखलाहट का मुख्य कारण है। कोर्ट-कचहरी और कानूनी मुकदमों का डर दिखाने वालों को भी उन्होंने आड़े हाथों लिया। उन्होंने समाज को आगाह करते हुए स्पष्ट किया कि जो केस बताए जा रहे हैं, वे अभी तक अन-रजिस्टर (Un-registered) हैं। कुछ वकील सिर्फ अपने निजी फायदे के लिए लोगों को गुमराह कर रहे हैं और हवा में तीर चलाए जा रहे हैं।
अपने बयान में चोपड़ा ने कुछ बेहद चुभने वाले प्रहार किए। उन्होंने कहा कि सामने वाला व्यक्ति खुद को एक ऐसी काल्पनिक यूनिवर्सिटी का भ्रष्ट कुलपति समझ बैठा है, जिसका काम सिर्फ दूसरों को चारित्र्य का फर्जी सर्टिफिकेट बांटना रह गया है। यह रवैया न केवल हास्यास्पद है, बल्कि समाज की एकता और अखंडता के लिए दीमक की तरह काम कर रहा है। जब कोई कम ज्ञान और कम अक्ल वाला व्यक्ति खुद को दुनिया का सबसे बड़ा बुद्धिमान समझने लगता है, तो वह केवल अपना ही नुकसान नहीं करता, बल्कि पूरे समाज को एक गहरे मानसिक संकट, अफवाहों और तनाव की खाई में धकेल देता है।
आज के इस आधुनिक और सूचनाओं के विस्फोट वाले युग में महानगर मेट्रो का भी यही नजरिया है कि समाज को ऐसे स्वयंभू जासूसों और डिजिटल अफवाहबाजों से बेहद सावधान रहने की जरूरत है। किसी भी व्हाट्सएप फॉरवर्ड या फेसबुक पोस्ट को सच मान लेने से पहले उसकी सत्यता की जांच करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। अभय चोपड़ा का यह बेबाक बयान एक चेतावनी भी है और एक आईना भी, जो दिखाता है कि अगर हमने जल्द ही इन बेबुनियाद जासूसी उपन्यासों की नकल को नहीं रोका, तो समाज का आपसी ताना-बाना बिखरने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। अब समय आ गया है कि समाज भावनाओं के बजाय तथ्यों और कानूनी हकीकत पर भरोसा करे।

