चेन्नई/नई दिल्ली | विशेष संवाददाता तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़े बदलाव की सुगबुगाहट तेज हो गई है। अभिनेता से नेता बने विजय (TVK) को कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों के समर्थन के ऐलान के बाद अब सरकार बनाने का रास्ता साफ नजर आ रहा है। हालांकि, इस घटनाक्रम को लेकर कुछ मीडिया हलकों में कांग्रेस और DMK के रिश्तों को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है।
गठबंधन का धर्म: सच क्या है?
मीडिया के एक वर्ग में यह विमर्श चलाया जा रहा है कि कांग्रेस ने DMK के साथ ‘विश्वासघात’ किया है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लेने जैसी नहीं है, बल्कि एक सोची-समझती रणनीति का हिस्सा है।
त्याग की राजनीति: चुनाव के दौरान विजय की पार्टी (TVK) ने कांग्रेस को 75 सीटों का बड़ा ऑफर दिया था, लेकिन कांग्रेस ने गठबंधन की मर्यादा रखते हुए DMK के साथ केवल 28 सीटों पर चुनाव लड़ना स्वीकार किया। यह कदम दर्शाता है कि कांग्रेस ने साझेदारी को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखा।
NDA को रोकने की चुनौती: मौजूदा परिस्थितियों में कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य विजय को NDA (भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन) के पाले में जाने से रोकना है। ऐसे में विजय को समर्थन देना एक स्वाभाविक राजनीतिक कदम माना जा रहा है।
DMK का बड़ा दिल: ‘सरकार बनाने में नहीं बनेंगे बाधा’
इस पूरे मामले पर DMK प्रमुख और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का रुख काफी सकारात्मक रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि DMK सत्ता के लिए किसी भी तरह का गतिरोध पैदा नहीं करना चाहती।

