रिश्तों के उस पार…हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमने स्त्री और पुरुष के रिश्ते को हमेशा एक निश्चित दायरे में ही देखा है। या तो वह खून के रिश्तों की पवित्रता होती है या फिर शादी और प्यार की सामाजिक स्वीकृति। इन दो किनारों के बीच ‘मैत्री’ (दोस्ती) नाम की जो विशाल नदी बहती है, उसे या तो हम पहचान नहीं पाए हैं या फिर पहचानने की हिम्मत नहीं कर पाए हैं। जब किसी पुरुष को कोई स्त्री अच्छी लगती है, तब समाज और उसकी अपनी प्रवृत्तियां उसे ‘प्रेमिका’ के सांचे में ढालने के लिए प्रेरित करती हैं। लेकिन, पसंद आने वाली स्त्री को प्रेमिका बनाना उसे सीमित कर देने जैसा है।
सच्ची मैत्री प्रेम से भी अधिक उदात्त और गहरा रिश्ता है, क्योंकि प्रेम में अक्सर ‘हक’ जताने की लालसा होती है, जबकि मैत्री में एक-दूसरे को ‘मुक्त’ रखने का आनंद होता है। यह बात उन लोगों के लिए है जो देह से परे जाकर आत्मा के जुड़ाव को समझना चाहते हैं।
प्रेमिका के साथ रिश्ते में अक्सर शब्दों, स्पष्टीकरणों और बार-बार अपनी भावनाओं को साबित करने की जरूरत पड़ती है। लेकिन एक स्त्री जब सच्ची ‘मित्र’ होती है न, तब वह आपके मौन का भी सटीक अनुवाद कर सकती है। जीवन के ऐसे मोड़ पर जहां आप दुनिया से हारकर, थककर चुपचाप बैठे हों, तब वह मित्र आपसे कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगेगी। वह आपकी विफलता के कारण नहीं पूछेगी, बल्कि सिर्फ आपके पास बैठकर आपको यह एहसास कराएगी कि, “मैं हूं ना!” यह नि:शब्द ‘होना’ ही किसी भी शारीरिक स्पर्श से हजारों गुना अधिक सांत्वना और शक्ति देता है।
आईने जैसी मित्रता… यानी
प्रेमिका शायद आपको खुश रखने के लिए, आपको झूठे लाड़-प्यार करने के लिए आपकी ‘हां’ में ‘हां’ मिलाए, लेकिन ‘सखी’ एक आईना है। वह आपकी गलती होने पर आपको रोकेगी, टोकेगी और जरूरत पड़ने पर लड़ेगी भी। मैत्री में कोई पाखंड नहीं होता। उसे आपको पाने या आपसे कुछ हासिल करने में कोई दिलचस्पी नहीं होती, उसे तो सिर्फ आपको ‘सामर्थ्यवान’ देखने में दिलचस्पी होती है। ऐसी मित्रता में पारदर्शी सत्य होता है, जहां आप जैसे हैं वैसे ही रह सकते हैं।
शारीरिकता से परे जिसमें मानसिक आलिंगन हो…
मैत्री यानी मानसिक आलिंगन, जिसमें शारीरिकता का कोई मोह नहीं है। जहां वासना खत्म होती है, वहीं से सच्ची मैत्री शुरू होती है। जो स्त्री आपकी बौद्धिक क्षमता को समझ सके, आपके विचारों के साथ संवाद कर सके और आपके व्यक्तित्व के अंधेरे कोनों को रोशन कर सके, वही आपकी सच्ची सखी है। शारीरिक आकर्षण तो समय के साथ फीका पड़ जाएगा, लेकिन जो मानसिक जुड़ाव विचारों से बंधा है, वह कभी बूढ़ा नहीं होता।
पुरुष की असली जीत यह है…
जो पुरुष स्त्री की देह को जीतने के बजाय उसके ‘विश्वास’ को जीत सके, वह पुरुष सही मायने में विजेता है। स्त्री को प्रेमिका बनाकर शायद आप उसे पा लेते हैं, लेकिन उसे मित्र बनाकर आप उसे पूरा आसमान देते हैं जहां वह अपने पंख फैला सके और आपको भी मुक्त आकाश में उड़ना सिखा सके। ऐसी पवित्रता निभाने के लिए पुरुष को भीतर से अत्यंत मजबूत और संयमी बनना पड़ता है।
हम ऐसे रिश्तों की दुनिया बसाएं जहां स्त्री और पुरुष सिर्फ दो देह नहीं, बल्कि दो पवित्र विचार बनकर मिलें। जहां शक के लिए कोई जगह न हो और जहां मर्यादा की देहरी ही विश्वास का आंगन बन जाए।
“वासना के बिना स्नेह और स्पर्श के बिना साथ, यही है स्त्री-पुरुष की मैत्री की असली ताकत।”
दर्शना पटेल : (नेशनल अवार्ड से सम्मानित) स्पोर्ट्स टीचर

