नई दिल्ली/गांधीनगर | महानगर संवाददाता : लोकतंत्र की बुनियादी ईकाई कहे जाने वाले पंचायत चुनावों में गुजरात से आई एक खबर ने देश की सबसे बड़ी अदालत को नाराज कर दिया है। गुजरात में हाल ही में लगभग 700 सीटों पर उम्मीदवारों के निर्विरोध (बिन-हलीफ) चुने जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार किया है। कोर्ट ने इसे लोकतंत्र के लिए एक चिंताजनक संकेत बताया है।
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी: “यह कैसा चुनाव?”
न्यायमूर्ति की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग और राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि:
इतनी बड़ी संख्या में सीटों का निर्विरोध होना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है।
क्या उम्मीदवारों को डराया-धमकाया गया या उन्हें नामांकन वापस लेने के लिए मजबूर किया गया?
यदि जनता को चुनने का विकल्प ही नहीं मिलता, तो चुनाव के मायने ही क्या रह जाते हैं?
700 सीटों का गणित और विपक्ष के आरोप
गुजरात में ग्राम पंचायत और अन्य स्थानीय निकायों के चुनावों में 700 सीटों पर एक ही उम्मीदवार मैदान में होने के कारण उन्हें विजेता घोषित कर दिया गया। विपक्ष का आरोप है कि सत्ता पक्ष के दबाव और प्रशासनिक मिलीभगत के कारण अन्य उम्मीदवारों को फॉर्म भरने नहीं दिया गया या उनके फॉर्म तकनीकी खामियां बताकर रद्द कर दिए गए।
लोकतंत्र के ‘उत्सव’ पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि स्थानीय निकाय चुनाव लोकतंत्र की जड़ें होते हैं। यदि यहीं पर ‘निर्विरोध’ चुने जाने का चलन बढ़ेगा, तो यह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को खत्म कर देगा। कोर्ट ने इस मामले में विस्तृत रिपोर्ट तलब की है और चुनाव आयोग से पूछा है कि निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए थे।
जनता का हक या राजनीतिक मिलीभगत?
महानगर मेट्रो की पड़ताल में यह बात सामने आई है कि कई गांवों में ‘समरस’ (निर्विरोध) पंचायत बनाने के नाम पर सरकारी अनुदान का लालच दिया जाता है, लेकिन इसके पीछे अक्सर स्थानीय रसूखदारों का दबाव काम करता है। कोर्ट की इस नाराजगी के बाद अब राज्य निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर भी उंगलियां उठने लगी हैं।

