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विशेष रिपोर्ट : वेंटिलेटर पर सरकारी सिस्टम, निजी अस्पतालों में लूट का खुला खेल!

स्वास्थ्य सेवाओं का ‘डोज’ आखिर इतना महंगा क्यों? सरकारी तंत्र की कमजोरी के पीछे किसका हित? जनता के टैक्स का पैसा जा कहां रहा है?

अहमदाबाद | विशेष जांच : लोकतंत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य बुनियादी जरूरतें हैं, लेकिन आज ज़मीनी हकीकत इसके उलट है। एक आम आदमी जब बीमार पड़ता है, तो सरकारी अस्पतालों के चक्कर काटते-काटते वह और अधिक बीमार हो जाता है। अंत में, मजबूर होकर उसे निजी (Private) अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है। सवाल यह है कि जो देश और राज्य ‘विकास’ की बातें करते हैं, वहां सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था दिन-प्रतिदिन इतनी जर्जर क्यों हो रही है? क्या यह जानबूझकर निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने का कोई सुनियोजित खेल है?

सरकारी व्यवस्था के ‘ब्रेन डेड’ होने के 5 मुख्य कारण

1 स्टाफ की भारी किल्लत: आलीशान इमारतें तो खड़ी कर दी गईं, लेकिन अंदर डॉक्टर और नर्स कहां हैं? विशेषज्ञ डॉक्टर सरकारी सेवा में आने के बजाय निजी प्रैक्टिस को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि वहां वेतन और सुविधाएं कहीं अधिक हैं।
2 इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव: कई सरकारी अस्पतालों में मशीनें तो हैं, लेकिन या तो वे खराब पड़ी हैं या उन्हें चलाने के लिए तकनीशियन (Technician) नहीं हैं। सीटी स्कैन या एमआरआई के लिए महीनों का इंतज़ार अब एक आम बात हो गई है।
3 बजट आवंटन में खानापूर्ति: हर साल स्वास्थ्य बजट बढ़ाने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर दवाओं की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव साफ झलकता है।
4 प्रशासनिक शिथिलता: सरकारी अस्पतालों में साफ-सफाई से लेकर मरीजों के प्रति व्यवहार तक, हर जगह लापरवाही का आलम है। जिस भरोसे के साथ मरीज अस्पताल आता है, वह अब पूरी तरह टूट चुका है।
5 निजीकरण को गुप्त बढ़ावा: स्वास्थ्य क्षेत्र में जिस तरह से ‘पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप’ (PPP) मॉडल बढ़ रहा है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि सरकारी तंत्र धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारियां निजी हाथों में सौंप रहा है।

निजी अस्पताल: ‘सेवा’ या ‘मुनाफे की मंडी’?

जब सरकारी तंत्र विफल होता है, तो निजी अस्पतालों के लिए रास्ता साफ हो जाता है।
बिल का बोझ: सामान्य बुखार में भी हजारों रुपये के टेस्ट और रिपोर्ट का खेल शुरू हो जाता है।
बीमा कंपनियों का जाल: भारी प्रीमियम भरकर बीमा लेने के बावजूद, निजी अस्पतालों के बिल देखकर मध्यम वर्ग की कमर टूट जाती है।

सवाल जनता का है…

क्या गरीब को सम्मान के साथ जीने का हक नहीं है? यदि सरकार टैक्स वसूलने में सबसे आगे है, तो इलाज के लिए एक मरीज को अपनी संपत्ति गिरवी क्यों रखनी पड़ती है?

महानगर मेट्रो का नज़रिया:

सरकार को केवल भव्य इमारतों के निर्माण से संतोष नहीं करना चाहिए। ज़रूरत है ज़मीनी स्तर पर डॉक्टरों की स्थायी भर्ती करने की, मुफ्त और उच्च गुणवत्ता वाली दवाएं उपलब्ध कराने की और सरकारी डॉक्टरों की जवाबदेही तय करने की। यदि आज यह व्यवस्था नहीं सुधरी, तो भविष्य में स्वास्थ्य सुविधाएं केवल अमीरों की जागीर बनकर रह जाएंगी।

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