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सूरत’ में बीजेपी की महिला उम्मीदवार पर ‘सियासी’ ग्र: तीन संतान, फिर भी हलफनामे में जानकारी ‘शून्य’; चुनाव आयोग की चौखट तक पहुँचा विवाद।

ब्यूरो रिपोर्ट : सूरत : गुजरात की राजनीति में ‘सूरत’ अब केवल विकास के लिए नहीं, बल्कि एक नए चुनावी विवाद के लिए चर्चा में है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) की एक महिला उम्मीदवार अपनी तीसरी संतान की जानकारी छिपाने के गंभीर आरोपों के घेरे में आ गई हैं। गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों के नियमों के मुताबिक, दो से अधिक संतान होने पर चुनाव लड़ने पर पाबंदी है, लेकिन यहाँ आरोप है कि उम्मीदवार ने हलफनामे (Affidavit) में तथ्यों को जानबूझकर दबाया है।

क्या है पूरा मामला?

सूरत नगर निगम के चुनावी रण में उतरीं भाजपा की महिला प्रत्याशी ने नामांकन पत्र भरते समय शपथ पत्र में अपनी संतानों की संख्या छिपाई। सूत्रों और विरोधियों का दावा है कि उम्मीदवार के तीन बच्चे हैं, जबकि सरकारी दस्तावेजों और चुनावी हलफनामे में उन्होंने इस सत्य को स्वीकार नहीं किया।
कानून की कसौटी पर उम्मीदवारी

गुजरात में स्थानीय निकाय चुनाव कानून के तहत

नियम: 2005 के बाद अगर किसी उम्मीदवार की तीसरी संतान होती है, तो वह चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य (Disqualified) माना जाता है।
विवाद: यदि यह आरोप सिद्ध हो जाता है, तो न केवल उनकी उम्मीदवारी रद्द हो सकती है, बल्कि गलत जानकारी देने के जुर्म में कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

विपक्ष हमलावर, जनता में चर्चा

विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने चुनाव आयोग से शिकायत कर मांग की है कि इस नामांकन को तुरंत रद्द किया जाए।

“जब सत्ताधारी दल के उम्मीदवार ही नियम तोड़ेंगे और झूठ का सहारा लेंगे, तो जनता से ईमानदारी की उम्मीद कैसे की जा सकती है?” — यह सवाल अब सूरत की गलियों में गूंज रहा है।

भाजपा खेमे में खलबली

इस खुलासे के बाद भाजपा संगठन के भीतर भी हड़कंप मचा हुआ है। टिकट वितरण प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या उम्मीदवार के बैकग्राउंड की सही जांच नहीं की गई थी? फिलहाल, पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक सफाई नहीं आई है, लेकिन उम्मीदवार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं।

महानगर मेट्रो का विश्लेषण

राजनीति में नैतिकता की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन जब कुर्सी की बात आती है, तो नियम अक्सर कागजों में दब जाते हैं। सूरत का यह ‘संतान विवाद’ अब सिर्फ एक चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि पारदर्शिता और कानून के पालन की परीक्षा बन गया है।

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