UAE, मिस्र और ऑस्ट्रेलिया में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके वरिष्ठ राजनयिक को अपने ही देश में नागरिकता और मताधिकार साबित करने के लिए करनी पड़ी मशक्कत, चुनावी प्रक्रिया पर उठे सवाल
अहमदाबाद। भारत का तिरंगा संयुक्त अरब अमीरात (UAE), मिस्र और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बुलंद करने वाले सेवानिवृत्त वरिष्ठ राजनयिक नवदीप सूरी को अपने ही देश में भारतीय नागरिक होने का प्रमाण देने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है। सरकारी प्रक्रियाओं और मतदाता सूची से जुड़ी कथित खामियों तथा पुनरीक्षण प्रक्रिया, जैसे एसआईआर और चुनाव पहचान पत्र से संबंधित प्रक्रियाओं की जटिलता ने एक बार फिर सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नवदीप सूरी जैसे व्यक्ति, जिन्होंने अपने करियर का बड़ा हिस्सा देश की सेवा और विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने में बिताया, यदि उन्हें भी अपनी नागरिकता और मताधिकार से जुड़ी प्रक्रिया पूरी करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें, तो यह व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल माना जा रहा है।
अगर पूर्व राजदूत की यह स्थिति है तो आम जनता का क्या होगा?
नवदीप सूरी के मामले ने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा किया है कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले और देश की सेवा कर चुके वरिष्ठ अधिकारी को भी ऐसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, तो उन लाखों सामान्य, गरीब और अशिक्षित नागरिकों की स्थिति क्या होती होगी, जिनके पास न राजनीतिक पहुंच है और न ही प्रशासनिक प्रभाव।
देश के अलग-अलग हिस्सों में समय-समय पर मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान नागरिकों के नाम गायब होने या नामों को रोक दिए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे मामलों में सामान्य नागरिकों को अपने मताधिकार को बनाए रखने के लिए जरूरी दस्तावेज लेकर सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कई लोगों के लिए यह प्रक्रिया बेहद कठिन साबित हो सकती है।
राजनीतिक गणित और चुनावी प्रक्रिया पर भी उठ रहे सवाल
बिहार, पश्चिम बंगाल और देश के अन्य राज्यों में चुनावों से पहले मतदाता सूची के पुनरीक्षण और नामों के हटाए जाने को लेकर विपक्ष तथा आम जनता की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।
वोट बैंक की राजनीति के आरोप: आरोप लगाए जा रहे हैं कि चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने के लिए कुछ क्षेत्रों या वर्गों के मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा सकते हैं। हालांकि ऐसे आरोपों की पुष्टि संबंधित जांच और आधिकारिक प्रक्रिया के आधार पर ही हो सकती है।
प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल: देश की सेवा कर चुके अधिकारियों और आम नागरिकों को अपनी पहचान, नागरिकता या मताधिकार से जुड़े दस्तावेज साबित करने के लिए बार-बार सरकारी प्रक्रिया से गुजरना पड़े तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था की जटिलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जनता के तीखे सवाल
इस पूरे मामले को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। देश का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व कर चुके पूर्व राजदूत को अपनी नागरिकता साबित करने की स्थिति क्यों आई? इसके लिए जिम्मेदार प्रक्रिया या अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय होगी? क्या चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान वास्तविक नागरिकों के मताधिकार की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है?
देश की विदेश नीति और राजनयिक संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके व्यक्ति को यदि अपने ही देश में अपनी पहचान और मताधिकार से जुड़ी प्रक्रिया को लेकर संघर्ष करना पड़े, तो यह केवल एक व्यक्ति की परेशानी का मामला नहीं रह जाता। यह चुनावी व्यवस्था, सरकारी प्रक्रियाओं और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर व्यापक बहस का विषय बन जाता है।

