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करजण में टेंडर माफिया का कथित खेल? VGL गैस लाइन के 8 करोड़ के काम में L-1 ठेकेदार को धमकी, L-2 को 9% ज्यादा रेट पर टेंडर देने के आरोप

महानगर मेट्रो। करजण तालुका में वडोदरा गैस लिमिटेड (VGL) की गैस लाइन बिछाने के काम से जुड़ा कथित टेंडर विवाद अब गंभीर आरोपों में बदलता नजर आ रहा है। आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया में L-1 ठेकेदार को काम शुरू करने से रोकने के लिए कथित तौर पर जान से मारने की धमकी दी गई और बाद में दोबारा टेंडर प्रक्रिया में L-2 ठेकेदार को अधिक दर पर काम दिए जाने से सरकारी धन पर अतिरिक्त बोझ पड़ा।

मिली जानकारी के मुताबिक, गैस लाइन परियोजना के लिए VGL की ओर से जारी टेंडर में तीन कंपनियों ने भाग लिया था। प्रक्रिया पूरी होने के बाद 4.5 प्रतिशत के आधार पर करीब 8 करोड़ रुपये का काम L-1 ठेकेदार को मंजूर किया गया था। आरोप है कि टेंडर मिलने के बाद L-1 कंपनी के मालिक को कथित तौर पर धमकी दी गई कि वह काम शुरू न करे, अन्यथा उसकी जान को खतरा हो सकता है। धमकी के कारण ठेकेदार ने काम शुरू नहीं किया और VGL को दोबारा टेंडर प्रक्रिया अपनानी पड़ी।

दूसरी टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि प्रभावशाली राजनीतिक संपर्क रखने वाले कुछ लोगों और कथित टेंडर माफिया के दबाव में L-1 प्रक्रिया को दरकिनार कर L-2 पक्ष को करीब 9 प्रतिशत अधिक दर पर काम दिया गया। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो सवाल यह है कि जब पात्र L-1 ठेकेदार उपलब्ध था, तो उसे हटाकर अधिक दर वाले ठेकेदार को काम देने का निर्णय किस आधार पर लिया गया और इससे सरकारी खजाने पर कितना अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ा।

इस मामले में करजण नगर पालिका के वित्तीय नुकसान का भी दावा किया जा रहा है। आरोपों के मुताबिक, परियोजना में नगर पालिका को पहले करीब 36 लाख रुपये का योगदान करना था, लेकिन टेंडर प्रक्रिया में कथित बदलाव के बाद यह बोझ बढ़कर करीब 72 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। परियोजना के लिए मुख्यमंत्री फंड से करीब 8 करोड़ रुपये मिलने की बात कही जा रही है, जबकि अतिरिक्त राशि नगर पालिका को वहन करनी है। ऐसे में नागरिकों का सवाल है कि यदि अधिक दर पर काम दिया गया है तो अतिरिक्त खर्च की जिम्मेदारी किसकी होगी।

सूत्रों के हवाले से यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि टेंडर से जुड़े प्रभावशाली लोगों में नगर पालिका के एक ताकतवर पार्षद का नाम सामने आ रहा है और कथित तौर पर उनके किसी करीबी के नाम से काम हासिल किया गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि किसी निर्वाचित नगर पालिका सदस्य या उसके करीबी का इस प्रक्रिया में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित साबित होता है, तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और हितों के टकराव के पहलू की भी जांच जरूरी होगी।

उठ रहे हैं कई बड़े सवाल

इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल L-1 ठेकेदार को कथित धमकी दिए जाने का है। यदि किसी ठेकेदार को वास्तव में धमकाकर सरकारी काम से हटाया गया, तो यह केवल टेंडर प्रक्रिया का मामला नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था और आपराधिक दबाव का भी विषय बनता है। दूसरा सवाल यह है कि 4.5 प्रतिशत की दर पर उपलब्ध L-1 ठेकेदार के रहते 9 प्रतिशत अधिक दर वाले L-2 को काम देने का निर्णय किन नियमों और परिस्थितियों में लिया गया।

इसके अलावा यह भी जांच का विषय है कि दोबारा टेंडर की जरूरत क्यों पड़ी, पहली प्रक्रिया में L-1 की पात्रता क्या थी, काम न शुरू करने के पीछे वास्तविक कारण क्या था और दूसरी प्रक्रिया में किस अधिकारी या प्राधिकरण ने अंतिम मंजूरी दी। टेंडर की पूरी फाइल, तकनीकी मूल्यांकन, वित्तीय बोली, वर्क ऑर्डर और संबंधित स्वीकृतियों की जांच से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

विजिलेंस, ACB और ED जांच की मांग

मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर हाई-लेवल जांच की मांग उठ रही है। मांग है कि VGL और नगर पालिका से जुड़े पूरे टेंडर रिकॉर्ड की स्वतंत्र विजिलेंस जांच कराई जाए और कथित धमकी की शिकायत की पुलिस स्तर पर भी निष्पक्ष जांच हो। इसके साथ ही, यदि जांच में भ्रष्टाचार, रिश्वत, बेनामी संपत्ति या सरकारी धन के दुरुपयोग से जुड़े ठोस साक्ष्य सामने आते हैं, तो संबंधित सक्षम एजेंसियों द्वारा नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाए।

जनता की ओर से यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि सरकारी परियोजनाओं में टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी है या प्रभावशाली लोगों के दबाव में नियम बदले जा रहे हैं। फिलहाल लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी, लेकिन 8 करोड़ रुपये की परियोजना और कथित तौर पर बढ़ी हुई दरों के कारण यह मामला गंभीर वित्तीय जांच की मांग करता है।

महानगर मेट्रो इस पूरे मामले में उठ रहे आरोपों, टेंडर प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल पर नजर बनाए रखेगा। जांच एजेंसियों की कार्रवाई और संबंधित विभागों का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि टेंडर प्रक्रिया में वास्तव में कोई अनियमितता हुई या नहीं।

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