गुजरात में शराबबंदी के बावजूद समय-समय पर होने वाली लिंचिंग की दुखद घटनाएं राज्य प्रशासन और पुलिस विभाग के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। भावनगर में लिंचिंग की दुखद घटना के बाद पूरा राज्य प्रशासन अचानक ऐसे एक्टिव हो गया है जैसे नींद से जाग गया हो। हर बार जब ऐसी कोई बड़ी आपदा आती है और बेगुनाह लोगों की जान जाती है, तो प्रशासन सख्त कार्रवाई करने के लिए दौड़ पड़ता है। शराब तस्करों पर छापे मारे जाते हैं, गाड़ियां जब्त की जाती हैं और कुछ दिनों तक मीडिया में चमकने के लिए ‘स्पेशल ड्राइव’ चलाई जाती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई लोगों का गुस्सा शांत करने तक ही सीमित है? अहमदाबाद पुलिस एक्शन मोड में: दो दिन में 215 मामले भावनगर की घटना की गूंज सुनते ही अहमदाबाद पुलिस भी एक्शन मोड में आ गई है। सिर्फ़ दो दिनों में शहर के अलग-अलग इलाकों में शराब के छोटे-बड़े 215 केस दर्ज किए गए हैं। इसके साथ ही, कई जाने-पहचाने बूटलेगरों पर सख्त एक्शन लेकर कानून का हथियार चलाया गया है। अहमदाबाद पुलिस के अलावा, स्टेट मॉनिटरिंग सेल (SMC) ने भी शहर में कई जगहों पर रेड मारकर बड़ी मात्रा में गैर-कानूनी शराब ज़ब्त की है। अभी के हालात ऐसे हैं कि शहर में आम लोगों के लिए शराब मिलना मुश्किल हो गया है और पुलिस की जांच या रेड के दौरान ही शराब ज़ब्त हो रही है।
‘घी में घी’: कुछ देर की कार्रवाई के बाद हालात पलट जाते हैं
इस पूरी तस्वीर का दूसरा और बहुत कड़वा पहलू यह है कि पुलिस तभी एक्शन में आती है जब गुजरात में हर तीन-चार साल में ऐसा कोई रैकेट होता है। रेड की हलचल खत्म होते ही, अखबारों की हेडलाइन बदल जाती हैं और मीडिया कवरेज शांत हो जाती है, हालात नॉर्मल हो जाते हैं। जैसे ‘घी में तेल रहता है’, वैसे ही कुछ समय बाद लोकल पुलिस की नाक के नीचे शराब और जुए के अड्डे फिर से फलने-फूलने लगते हैं। सिस्टम की यह टेम्पररी जागरूकता और कागज़ पर बने सख्त कानून अपराधियों को खुली छूट देते हैं।
नागरिकों का गुस्सा: ‘टेम्पररी ड्राइव नहीं, परमानेंट सॉल्यूशन चाहिए’
अहमदाबाद के जागरूक नागरिकों और लोगों का साफ मानना है कि अगर पुलिस की ऐसी ड्राइव सिर्फ दो-चार दिन तक सीमित न रहकर पूरे साल लगातार चलाई जाएं, तभी शराब की इस बुराई को हमेशा के लिए रोका जा सकता है। अगर पुलिस और स्टेट मॉनिटरिंग सेल बिना किसी पॉलिटिकल या फाइनेंशियल दबाव के जबरन वसूली रोके और सख्त कदम उठाए, तभी राज्य में शराबबंदी कानून का सही मायने में पालन हो पाएगा।
अब देखना यह है कि भावनगर की घटना के बाद शुरू हुई यह सख्त कार्रवाई कितने दिन चलती है। क्या पुलिस इस बार भी बूटलेगर और शराब के पूरे नेटवर्क को जड़ से खत्म कर पाएगी या हर बार की तरह ड्राइव खत्म होते ही अड्डे फिर से शुरू हो जाएंगे? पाक्को गुजरात न्यूज़ सिस्टम की हर हरकत और इस ऑपरेशन पर लगातार नज़र रखेगा।

