PM मोदी के ₹2500 करोड़ से ज़्यादा के विदेश दौरे और हाईवे पर खड़ंजा लोगों पर टैक्स का बोझ: देश का आम नागरिक राजनीतिक पार्टियों के फंड और आलीशान ऑफिस की चकाचौंध झेलने को मजबूर है!
अहमदाबाद/गांधीनगर : देश आज एक अजीब और चिंताजनक उलझन से गुज़र रहा है। एक तरफ केंद्र सरकार का कुल कर्ज़ 2014 के ₹58.6 लाख करोड़ से बढ़कर आज लगभग ₹180 लाख करोड़ के ऐतिहासिक लेवल पर पहुँच गया है, प्रधानमंत्री के विदेश दौरों की वजह से सरकार को ₹2,500 करोड़ से ज़्यादा का चूना लगा है, और गांवों के सरकारी स्कूल सुविधाओं की कमी की वजह से बंद होने की नौबत का सामना कर रहे हैं। दूसरी तरफ, सत्ताधारी पार्टी RSS, BJP और उसके संगठनों का चंदा और देश के कोने-कोने में बने कॉर्पोरेट स्टाइल के हाई-टेक ऑफिस का डेवलपमेंट रॉकेट स्पीड से हो रहा है। यह हालत देखकर आम नागरिक अब खुलकर सवाल कर रहा है कि देश में डेवलपमेंट जनता के लिए हो रहा है या सिर्फ राजनीतिक संगठनों के लिए?
स्कूलों में ताले और आलीशान ऑफिस का उद्घाटन
सरकारी स्कूलों की दयनीय हालत आज किसी से छिपी नहीं है। एक तरफ, टीचर, पीने के पानी और टॉयलेट की कमी के कारण सरकारी स्कूल बंद या मर्ज किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ, देश के हर जिले में करोड़ों की लागत से रातों-रात BJP के मल्टी-स्टोरी, AC वाले और आलीशान ऑफिस बन गए हैं। गरीब और मिडिल क्लास के बच्चों की पढ़ाई का लेवल गिर रहा है, लेकिन राजनीतिक पार्टियों का फंड और उनकी दौलत हजार गुना बढ़ रही है।
देश पर कर्ज, जनता पर टैक्स और फायदा किसे?
आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि आज देश के हर नागरिक पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है। महंगाई और GST से परेशान आम लोग पेट्रोल, डीजल और खाने-पीने की चीजों पर भारी टैक्स दे रहे हैं।
अगर देश इंफ्रास्ट्रक्चर और CapEx के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है, तो हल्की बारिश में नेशनल हाईवे क्यों बह जाता है?
अगर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी एजुकेशन और हेल्थ सेक्टर प्राइवेट माफियाओं के हाथों में जा रहा है, तो जनता की मेहनत की कमाई कहां जाती है?
जनता के मन में उठ रहे कड़वे सवाल
क्या देश की दौलत और सरकारी खजाने का इस्तेमाल लोगों की बेसिक सुविधाएं बेहतर बनाने के लिए होना चाहिए या पॉलिटिकल ऑर्गनाइजेशन को बढ़ाने और विदेशी दौरों की चमक-दमक के लिए?
सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को वर्ल्ड-क्लास बनाने के बजाय, शासक सिर्फ अपनी पार्टियों के लिए बड़ी फंडिंग और हेडक्वार्टर बनाने में क्यों बिज़ी हैं?
2014 से देश का कर्ज तीन गुना हो गया है, लेकिन आम आदमी की इनकम या स्टैंडर्ड ऑफ़ लिविंग कितना बेहतर हुआ है? जब चुनाव आते हैं तो जनता को बड़े-बड़े एडवर्टाइजमेंट और नारों से बेवकूफ बनाया जाता है, लेकिन असलियत यह है कि आज देश का आम टैक्सपेयर गड्ढों वाली सड़कों, खराब शिक्षा और महंगाई से परेशान है, जबकि राजनीतिक पार्टियों के फंड और ऑफिस का “डेवलपमेंट” बुलेट ट्रेन की स्पीड से चल रहा है। जनता अब इन दोहरे मापदंडों को समझने लगी है।

