सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता और दल-बदल याचिका पर बड़ा निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष को दो महीने के भीतर नियमानुसार फैसला लेने को कहा है। यह आदेश नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया है।
सागर: बीना विधानसभा सीट से विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश दिया है कि वे दो महीने के भीतर इस मामले में नियमानुसार उचित फैसला लें। यह आदेश प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता उमंग सिंघार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद आया है।
दल बदल कानून के उल्लंघन का आरोप
गौरतलब है कि निर्मला सप्रे ने वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर बीना सीट से जीत हासिल की थी। हालांकि, चुनाव जीतने के कुछ समय बाद ही वह बीजेपी में शामिल हो गईं। इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने इसे संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल कानून का उल्लंघन बताते हुए उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने याचिकाकर्ता का पक्ष रखा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि दल-बदल विरोधी कानून से जुड़े मामलों का समयबद्ध और तुरंत निराकरण किया जाना बहुत जरूरी है। अदालत ने माना कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे मामलों को लंबे समय तक लंबित नहीं रखा जा सकता। वहीं, दूसरी ओर विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर इस मामले में सुनवाई की प्रक्रिया पहले ही पूरी कर चुके हैं और दोनों पक्षों की ओर से दस्तावेज व जवाब दाखिल किए जा चुके हैं।
क्या कहता है दल-बदल विरोधी कानून?
दसवीं अनुसूची: भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून तय किया गया है। इसके जरिए निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा राजनीतिक दल बदलने पर रोक लगाने और अयोग्यता तय करने के नियम बनाए गए हैं।
फैसले का अधिकार: संविधान के नियमों के मुताबिक, किसी विधायक या सांसद के दल-बदल या सदस्यता अयोग्यता से जुड़े मामलों पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार संबंधित सदन के स्पीकर के पास होता है।

