*रायपुर / * देशभर में एक संगठित फर्जीवाड़ा सामने आ रहा है, जिसमें सरकारी तंत्र में बैठे लोग ही आम आदमी और बेरोजगार युवाओं दोनों का हक मार रहे हैं।
बहुत सारे सरकारी कर्मचारी – , शिक्षक, सहकारी सोसाइटियों के मैनेजर, कंप्यूटर ऑपरेटर, सेल्समैन – अपनी पत्नी के नाम पर बीमा एजेंसी का कोड लेकर अवैध रूप से बीमा का कारोबार कर रहे हैं। जो सरकारी नियमों के आधार पर पूरी तरह गैरकानूनी है l
फर्जीवाड़े का तरीका
ये कर्मचारी खुद तो सरकारी नियमों के कारण लाइसेंस नहीं ले सकते, इसलिए पत्नी के नाम पर एजेंसी ले लेते हैं। ग्राहक को प्लान समझाना, फॉर्म भरना सब पति ही करता है और अंत में प्रपोजल फॉर्म पर पत्नी के जाली हस्ताक्षर खुद ही कर देता है। ग्राहक को लगता है कि उसकी पॉलिसी एक वैध एजेंट ने की है, जबकि कागज पर सब कुछ फर्जी होता है।
सबसे बड़ा नुकसान – बेरोजगारों के पेट पर लात
इस काले धंधे का सबसे दर्दनाक पहलू ये है कि ये लोग बेरोजगारों के अधिकार पर सीधा अतिक्रमण कर रहे हैं।
गाँव-देहात में लोग गुरुजी, सरकारी कर्मचारी पर आंख बंद करके ज्यादा भरोसा करते हैं। लोग सोचते हैं – “गुरुजी कह रहे हैं तो सही ही होगा।” इसी भरोसे के चक्कर में लोग उसी सरकारी कर्मचारी से पॉलिसी ले लेते हैं।
इसका नतीजा क्या होता है?
एक बेरोजगार नौजवान जिसने मेहनत से IRDAI की परीक्षा पास की है, जो पूरी ईमानदारी से बीमा को ही अपना रोजगार बनाना चाहता है, उसे पॉलिसी नहीं मिलती। ग्राहक पहले ही सरकारी कर्मचारी के जाल में फंस चुका होता है। थक-हार कर वो बेरोजगार युवा ये काम ही छोड़ देता है।
मतलब एक सरकारी आदमी, जो पहले से ही वेतन ले रहा है, वो लगभग 400 बेरोजगार एजेंटों का रोजगार अकेले खा जाता है। यह सीधे-सीधे रोजगार के अधिकार पर डाका है।
कानूनी तौर पर भी पूरी तरह अवैध
- सरकारी सेवा आचरण नियम का उल्लंघन: चाहे छत्तीसगढ़ हो, बिहार हो या कोई भी राज्य – सभी राज्यों के सिविल सेवा आचरण नियम कहते हैं कि कोई सरकारी सेवक बीमा एजेंसी अथवा शासकीय या अर्ध शासकीय किसी भी उपक्रम हमें कार्य नहीं कर सकता। पत्नी के नाम पर अप्रत्यक्ष रूप से धंधा करना भी नियमों का उल्लंघन हैl
- IRDAI के नियमों का उल्लंघन: बीमा वही बेच सकता है जिसने खुद परीक्षा पास की हो। दूसरे के कोड पर काम करना और जाली हस्ताक्षर करना गंभीर अपराध है।
- पॉलिसी का ही फर्जी हो जाना: आईरा इंटरनेशनल रिपोर्टर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत वर्मा जी ने इस पर कड़ी निंदा करते हुए कहा है – “इनके द्वारा की गई पॉलिसी कोर्ट में फर्जी घोषित हो सकती है, क्योंकि सलाहकार ही फर्जी है और हस्ताक्षर भी जाली है। अगर क्लेम के समय कंपनी ने यह कह दिया कि पॉलिसी की जानकारी फर्जी एजेंट द्वारा दिया गया है एजेंट फर्जी है, क्योंकि जब एजेंट के हस्ताक्षर जांच किया जाएगा तो हस्ताक्षर भी फर्जी निकलेगा. तो ग्राहक का क्या होगा। इसका जिम्मेदार कौन होगा?”
मांग – प्रशासन और बीमा कंपनियां ऐसे सभी फर्जी कोडो की जांच कर उन्हें तत्काल निरस्त करें और दोषी कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई करें, ताकि ईमानदार बेरोजगार एजेंटों को उनका हक मिल सके।

