अमित शाह के बयान के बाद बहस तेज, 13.39 करोड़ नाम हटाए जाने के दावे से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी निष्पक्षता तक कई सवालों के घेरे में पूरी प्रक्रिया
अहमदाबाद/नई दिल्ली। देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज होती जा रही है। इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हालिया बयान ने इस विवाद को और हवा दे दी है। 13 अक्टूबर 2026 को आयोजित पत्रकार वार्ता में शाह ने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी घुसपैठियों का बचाव कर रहे हैं। उन्होंने यह दावा भी किया कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन 2029 के लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगा। इस बयान के बाद सवाल उठ रहे हैं कि घुसपैठ का मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है या इसके राजनीतिक निहितार्थ भी हैं?
एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने को लेकर भी विवाद सामने आया है। लेख में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, लगभग 95.40 करोड़ मतदाताओं की जांच के दौरान 13.39 करोड़ नाम हटाए जाने का दावा किया गया है। यदि इन आंकड़ों को आधार माना जाए तो हटाए गए नामों का अनुपात करीब 14 प्रतिशत बैठता है। हालांकि, मतदाता सूची से नाम हटने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति घुसपैठिया है। नाम हटने के पीछे मृत्यु, स्थान परिवर्तन, दोहरी प्रविष्टि, दस्तावेजों की कमी या अन्य कारण भी हो सकते हैं। इसलिए इन आंकड़ों को सीधे अवैध प्रवासियों की संख्या बताना उचित नहीं होगा।
लेख में यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि हटाए गए मतदाताओं के परिवारों और नाबालिग बच्चों को जोड़कर देश में 25 से 30 करोड़ घुसपैठियों की मौजूदगी का दावा किया जा रहा है, तो इस अनुमान का ठोस आधार क्या है? क्या इतनी बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी देश में रह रहे हैं, और यदि ऐसा है तो सरकार के पास उनकी पहचान तथा निष्कासन की क्या योजना है? इतने गंभीर दावे केवल अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणित आंकड़ों से स्पष्ट होने चाहिए।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार और भाजपा लंबे समय से घुसपैठ को राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर मुद्दा बताती रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि देश में अवैध प्रवासियों की संख्या इतनी बड़ी है, तो अब तक उनके खिलाफ कितनी प्रभावी कार्रवाई हुई है? पश्चिम बंगाल सहित सीमावर्ती राज्यों में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया को लेकर भी विवाद है। लेकिन मतदाता सूची से नाम हटाना और किसी व्यक्ति को अवैध प्रवासी साबित करना दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। सरकार को इन दोनों के बीच अंतर स्पष्ट करना चाहिए।
पड़ोसी देशों की जनसंख्या के आधार पर भी लेख में घुसपैठ के दावों पर सवाल उठाए गए हैं। बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल जैसे देशों से भारत में आने वाले लोगों की वास्तविक संख्या, उनके आने के कारण और कानूनी स्थिति का प्रमाणिक विवरण सामने आना चाहिए। नेपाल के नागरिकों के लिए भारत में आवाजाही के विशेष प्रावधान हैं, जबकि अन्य देशों के नागरिकों के मामले में अलग-अलग कानूनी नियम लागू होते हैं। ऐसे में सभी को एक ही श्रेणी में रखना सही नहीं होगा।
विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू चुनाव आयोग की जवाबदेही और उसके अधिकारियों को मिलने वाला कानूनी संरक्षण भी है। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। इसलिए आयोग के फैसलों, मतदाता सूची में बदलाव और अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर उठने वाले सवालों का पारदर्शी तरीके से जवाब दिया जाना जरूरी है। किसी भी संवैधानिक संस्था पर सवाल उठने की स्थिति में तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर स्पष्टीकरण मिलना चाहिए।
आखिरकार, सवाल केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा, नागरिकों के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर जनता के भरोसे का है। यदि सरकार के पास करोड़ों घुसपैठियों की मौजूदगी के प्रमाण हैं तो उन्हें सार्वजनिक कर कानूनी कार्रवाई की जानकारी देनी चाहिए। और यदि आंकड़ों को लेकर भ्रम है तो उसे भी दूर करना चाहिए। देश की जनता को केवल बड़े-बड़े दावे नहीं, बल्कि प्रमाण, पारदर्शिता और ठोस कार्रवाई चाहिए। 25 करोड़ घुसपैठियों का दावा करने वालों से यही सवाल है—यदि यह आंकड़ा सही है तो उन्हें देश से बाहर निकालने की ठोस योजना और अब तक हुई कार्रवाई का हिसाब भी सामने आना चाहिए।

