Homeधर्मदिवाली या दीये तले अंधेरा? 'बेटी की सुरक्षा' की आड़ में महिलाओं...

दिवाली या दीये तले अंधेरा? ‘बेटी की सुरक्षा’ की आड़ में महिलाओं की स्वतंत्रता छीनने की आवाज या पुरुषवादी मानसिकता का प्रदर्शन?

सुरक्षा के नाम पर नारी स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास: क्या महिलाएं कमजोर हैं?
कानून-व्यवस्था होने के बावजूद सीएम या सरकारी तंत्र द्वारा ऐसे विचार क्यों? क्या SPG या सत्ता कानून से भी ऊपर है?
पितृसत्तात्मक मानसिकता का नया अंदाज: समानता और स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार

आज के आधुनिक युग में जब बेटियां अंतरिक्ष से लेकर देश के सर्वोच्च शिखरों को छू रही हैं, वहीं दूसरी ओर सत्ता और व्यवस्था के शीर्ष पदों पर बैठे कुछ वर्गों की मानसिकता आज भी मध्ययुगीन रूढ़िवादिता और पितृसत्तात्मक जंजीरों में जकड़ी हुई है। हाल ही में “बेटी की सुरक्षा” और हिफाजत के नाम पर महिलाओं की स्वतंत्रता और गतिशीलता को सीमित करने वाले जो सुर उठ रहे हैं, उसने पूरे राज्य की नारी शक्ति में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। ‘पाक्को गुजरात’ इस गंभीर मुद्दे पर सवाल उठाता है कि क्या सुरक्षा देने के नाम पर महिलाओं को कमजोर और असहाय साबित करने का यह कोई सुनियोजित षड्यंत्र है?

क्या ‘सुरक्षा’ का मतलब स्वतंत्रता पर प्रतिबंध है?

सवाल यह उठता है कि सुरक्षा कौन मांगता है और किससे मांगता है? यदि समाज या राज्य में कानून और व्यवस्था का शासन है, तो फिर महिलाओं की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाने वाले फरमान क्यों जारी किए जाते हैं? यदि कोई यह मानता है कि महिलाओं की सुरक्षा करनी ही होगी, इसलिए वे अपनी मर्जी से जीवन नहीं जी सकतीं, तो यह सीधे तौर पर महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता के अधिकार का विरोध है।

नारी स्वतंत्रता कोई भीख नहीं है, बल्कि संविधान द्वारा दिया गया एक मौलिक अधिकार है। सुरक्षा के नाम पर बेटियों की स्वतंत्र आवाजाही और उनके निर्णयों पर अंकुश लगाना केवल एक मानसिक गुलामी की निशानी है।

क्या SPG या सत्ता तंत्र कानून और व्यवस्था से भी ऊपर है?

हमारे देश और राज्य में नागरिकों की सुरक्षा के लिए पुलिस, न्यायपालिका और एक मजबूत कानून-व्यवस्था मौजूद है। तो फिर क्या ये व्यवस्थाएं विफल साबित हो चुकी हैं? यदि कानून और व्यवस्था के होने के बावजूद कोई संस्था या व्यवस्था यह मानती है कि महिलाओं को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें कैद करना पड़ेगा या उनकी स्वतंत्रता छीननी होगी, तो इसका मतलब यह है कि वे कानून और व्यवस्था पर भरोसा नहीं करते—या फिर वे खुद को कानून और व्यवस्था से भी ऊपर मानते हैं।

पुरुष प्रधान मानसिकता का खुला प्रदर्शन

इस प्रकार के विचारों के पीछे केवल और केवल सदियों पुरानी पुरुष प्रधान (पितृसत्तात्मक) मानसिकता काम कर रही है। पुरुषवादी अहंकार हमेशा से इस बात से डरता आया है कि यदि स्त्री स्वतंत्र हो जाएगी, अपने फैसले खुद लेगी और आत्मनिर्भर बनेगी, तो यह शोषणकारी व्यवस्था टूट जाएगी। यही वजह है कि सुरक्षा का आशीर्वाद रूपी मुखौटा पहनकर असल में नारी की आवाज को दबाने के पैंतरे रचे जाते हैं।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments