सब-टाइटल: पूर्व कुलपति नीरजा गुप्ता और रजिस्ट्रार की संदिग्ध भूमिका सवालों के घेरे में, शिक्षा जगत में मचा हड़कंप!
अमदावाद स्थित गुजरात यूनिवर्सिटी एक बार फिर शिक्षा के बजाय बड़े घोटालों और विवादों के कारण चर्चा के केंद्र में आ गई है। यूनिवर्सिटी कैंपस में करोड़ों रुपये के विकास और निर्माण कार्यों को लेकर एक बड़ा पर्दाफाश हुआ है। पूरा मामला करीब 32 करोड़ रुपये के भारी-भरकम खर्च से जुड़ा है, जिसमें सत्ताधीशों ने पारदर्शिता को ताक पर रखकर मनमानी करने के गंभीर आरोप झेले हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े आर्थिक फैसले लेते समय यूनिवर्सिटी की सर्वोच्च निर्णयक समिति कही जाने वाली ‘एक्जीक्यूटिव काउंसिल’ को पूरी तरह अंधेरे में क्यों रखा गया?
कागज पर विकास और अंदरखाने बड़ा घोटाला?
सूत्रों के मुताबिक, यूनिवर्सिटी में लाखों-करोड़ों रुपये के खर्च से होने वाले निर्माण और अन्य कार्यों की मंजूरी की प्रक्रिया में भारी भ्रष्टाचार और नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। एक्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्यों को बिना जानकारी दिए या उनकी मंजूरी के बिना ही फाइलें पास कर दिए जाने की बात सामने आते ही शिक्षा जगत में भूचाल आ गया है। जब यूनिवर्सिटी में कोई बड़ा प्रोजेक्ट या वित्तीय खर्च करना होता है, तो आधिकारिक रूप से काउंसिल के समक्ष प्रस्तुति देकर चर्चा होना अनिवार्य है। लेकिन यहां तो पूरी व्यवस्था को दरकिनार करके बंद दरवाजों के पीछे फैसले लिए जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
पूर्व कुलपति नीरजा गुप्ता और रजिस्ट्रार की भूमिका संदेह के दायरे में
इस पूरे विवाद की आंच सीधे तौर पर गुजरात यूनिवर्सिटी की पूर्व कुलपति डॉ. नीरजा गुप्ता और यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार पर जाकर टिकती है। उनकी कार्यशैली और प्रशासनिक फैसले अब सीधे तौर पर सवालों के घेरे में आ चुके हैं। इतनी बड़ी रकम के आवंटन और मंजूरी के पीछे किसका निजी स्वार्थ था? एक्जीक्यूटिव काउंसिल को भरोसे में न लेने के पीछे असली वजह क्या थी? क्या इन कामों में रसूखदारों को फायदा पहुंचाने के लिए प्रक्रिया को तेज करके नियमों को ताक पर रख दिया गया? ये तमाम सवाल इस वक्त छात्र जगत और शैक्षणिक हलकों में चर्चा का विषय बने हुए हैं।
शिक्षा के पवित्र धाम में करोड़ों के खेल पर जनता का आक्रोश
जिस यूनिवर्सिटी में युवाओं का भविष्य गढ़ा जाना चाहिए, वहां अगर इस तरह पारदर्शिता की बलि चढ़ाई जा रही हो और अंधाधुंध मनमानी की जा रही हो, तो यह बेहद शर्मनाक है। 32 करोड़ रुपये के इन विवादित कामों की यदि निष्पक्ष जांच की जाए तो और भी कई बड़े नाम और घोटाले सामने आ सकते हैं। क्या सरकार या उच्च शिक्षा विभाग इस मामले में कड़ी कार्रवाई करेगा या फिर ये फाइलें भी कागजों में ही दबा दी जाएंगी?

