असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) के नेशनल स्पोक्सपर्सन असीम वकार के एक बहुत ही चौंकाने वाले और विवादित बयान ने देश की पॉलिटिक्स में बड़ा धमाका कर दिया है। असीम वकार ने पब्लिक प्लेटफॉर्म से सीधे और खुले तौर पर यह सच माना है कि उनकी पार्टी BJP के खिलाफ लड़ने का दावा करती है, लेकिन उनकी पॉलिटिकल लड़ाई का सीधा और बड़ा फायदा आखिर में BJP को ही पहुंचता है। AIMIM के अपने सीनियर लीडर के इस बयान के बाद विपक्षी खेमे में सन्नाटा पसर गया है।
‘हम BJP की ‘B’ टीम हैं?’: वकार के खुद के कन्फर्म करने से सवाल खड़े होते हैं
लंबे समय से कांग्रेस समेत देश की सभी रीजनल विपक्षी पार्टियां यह आरोप लगाती रही हैं कि AIMIM BJP की ‘B’ टीम की तरह काम कर रही है और चुनावों में मुस्लिम वोटों को बांटकर BJP की जीत का रास्ता बना रही है। अब तक ओवैसी और उनकी पार्टी इन आरोपों से इनकार करती रही थी। लेकिन अब खुद नेशनल स्पोक्सपर्सन असीम वकार के इस ऑन-कैमरा कबूलनामे ने साबित कर दिया है कि विपक्ष के आरोप बेबुनियाद नहीं थे।
और कौन कर रहा है यह? इंडियन पॉलिटिक्स का कड़वा सच
असीम वकार के इस बयान के बाद, अब पॉलिटिकल एनालिस्ट और जनता के बीच यह सवाल ज़ोरों पर उठ रहा है: “और कौन कर रहा है यह?”
अगर हम इंडियन पॉलिटिक्स के इतिहास और मौजूदा हालात को देखें, तो चुनावों के दौरान ‘वोट बांटने वाली’ पार्टियों की भूमिका हमेशा से ही सवालों के घेरे में रही है:
वोट बैंक बंटवारे का गणित: जब भी चुनाव आते हैं, तो कुछ छोटी और रीजनल पार्टियां अपने कैंडिडेट उन इलाकों में उतारती हैं, जहां विपक्ष मजबूत स्थिति में होता है। ये पार्टियां BJP विरोधी या किसी खास कम्युनिटी के वोट काटती हैं, जिससे असली विपक्ष का कैंडिडेट हार जाता है और BJP आसानी से जीत जाती है।
रीजनल पार्टियों का दोहरा रवैया: बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बंगाल जैसे राज्यों में बार-बार यह आरोप लगते रहे हैं कि ऐसी कुछ पार्टियां विपक्षी एकता में दखल देकर सीधे या परोक्ष रूप से पर्दे के पीछे से रूलिंग पार्टी को फायदा पहुंचा रही हैं। पक्के गुजरात का सवाल: क्या यह सिर्फ़ एक अनजाने में हुई गलती है या पहले से प्लान की गई स्क्रिप्ट है?
असीम वकार का यह बयान सिर्फ़ एक पार्टी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश की डेमोक्रेसी और चुनावी प्रोसेस पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। क्या BJP से लड़ने का दावा करने वाली पार्टियां सच में सोच की लड़ाई लड़ रही हैं, या वे रूलिंग पार्टी को सीटें दिलाने के लिए किसी बड़ी पॉलिटिकल साज़िश के तहत जनता के वोट बांटने का खेल खेल रही हैं? इस बात को मानने से अब वोटर्स सोच में पड़ गए हैं।

