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ठेरका गांव में रेलवे लाइन का कड़ा विरोध: “ज़मीन हमारी मां है, हम इसे किसी भी कीमत पर नहीं देंगे”

पंचकृष्ण मंदिर में किसानों और गांववालों की मीटिंग; ज़मीन न देने के लिए ग्राम पंचायत में एकमत प्रस्ताव की मांग, 9 अगस्त को वर्ल्ड ट्राइबल डे के मौके पर सरकार की इस योजना का विरोध दर्ज कराने का फैसला

पंकज पंडित झालोद : झालोद तालुका के ठेरका गांव में मौजूद पंचकृष्ण मंदिर में प्रस्तावित रेलवे लाइन को लेकर किसानों और गांववालों की एक ज़रूरी मीटिंग हुई। मीटिंग में बड़ी संख्या में किसान, आदिवासी समुदाय के नेता, युवा और गांववाले मौजूद थे। मीटिंग के दौरान एकसुर ने प्रस्तावित रेलवे लाइन का विरोध जताया और सरकार के सामने इसे दूसरे दूसरे रास्ते से गुजारने की मांग की।

मीटिंग में गांववालों ने कहा कि ग्राम पंचायत एकमत प्रस्ताव पास करके सरकार को साफ-साफ बताए कि गांव के किसान किसी भी प्रोजेक्ट के लिए अपनी खेती की ज़मीन देने को तैयार नहीं हैं। किसानों के मुताबिक, ज़मीन सिर्फ़ एक एसेट नहीं है, बल्कि यह उनके परिवार की रोज़ी-रोटी, इनकम और अगली पीढ़ी के भविष्य का आधार है।

किसानों के मुताबिक, पिछले कुछ सालों से कॉरिडोर, एयरपोर्ट, GIDC और अब रेलवे जैसे अलग-अलग प्रोजेक्ट्स के नाम पर किसानों की उपजाऊ ज़मीन को एक्वायर करने का प्रोसेस चल रहा है। ऐसे प्रोजेक्ट्स से लोकल आदिवासी किसानों को कोई सीधा फ़ायदा नहीं होगा, जबकि उनकी रोज़ी-रोटी छिनने का डर है।

मीटिंग में यह भी आरोप लगाया गया कि प्रस्तावित रेलवे लाइन के तहत लगभग 28 किसानों की ज़मीन प्रभावित होने की संभावना है। सर्वे करने आए अधिकारियों से जब किसानों ने प्रोजेक्ट का मैप, ज़मीन एक्वायर करने की डिटेल्स और प्रभावित किसानों की जानकारी मांगी, तो उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया और कहा गया कि उनके पास जानकारी देने का अधिकार नहीं है।

मीटिंग में किसानों ने 73AA के तहत आदिवासी ज़मीन के कानूनी संरक्षण का मुद्दा भी उठाया। किसानों ने कहा कि इस ज़मीन पर आदिवासी समुदाय का खास अधिकार है और किसानों की सहमति के बिना कोई भी कार्रवाई करना सही नहीं है।

किसान नेता मुकेश डांगी का बयान : किसान नेता मुकेश डांगी ने कहा,

“किसानों के लिए जल, जंगल और ज़मीन सिर्फ़ संपत्ति नहीं हैं, बल्कि ये उनकी ज़िंदगी, संस्कृति और वजूद हैं। ज़मीन हमारी माँ जैसी है और माँ को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ा जाएगा। आज विकास के नाम पर एक के बाद एक प्रोजेक्ट लाकर आदिवासी किसानों को उनकी ही ज़मीन से हटाने की कोशिश की जा रही है। यह लड़ाई किसी राजनीतिक पार्टी की नहीं है, बल्कि किसानों के वजूद की लड़ाई है। हम सरकार को साफ़ मैसेज देना चाहते हैं कि किसानों की मर्ज़ी के बिना कोई भी प्रोजेक्ट मंज़ूर नहीं है। अगर हमारी बात नहीं सुनी गई, तो हम गांधीजी के अहिंसक तरीके से विरोध करेंगे, धरने देंगे और ज़रूरत पड़ी तो आमरण अनशन भी करेंगे।”

किसान नेता कनुभाई डामोर का बयान : किसान नेता कनुभाई डामोर ने कहा,

“73AA के तहत ज़मीन आदिवासी किसानों के हक से जुड़ी ज़मीन है। किसानों को भरोसे में लिए बिना किसी को भी डेवलपमेंट के नाम पर उनकी ज़मीन लेने का हक नहीं है। सरकार को पहले प्रोजेक्ट के बारे में पूरी जानकारी देनी चाहिए, प्रभावित किसानों से खुली बातचीत करनी चाहिए और उसके बाद ही कोई फैसला लेना चाहिए। किसान की ज़मीन उसकी इनकम, ज़िंदगी और उसके बच्चों के भविष्य का आधार है। हम अपनी आखिरी सांस तक कानूनी और डेमोक्रेटिक तरीकों से किसानों के हक के लिए लड़ते रहेंगे।”

मीटिंग में आगे यह भी तय हुआ कि 9 अगस्त को वर्ल्ड ट्राइबल डे के मौके पर सरकार की ज़मीन अधिग्रहण पॉलिसी के खिलाफ बैनर लेकर प्रोटेस्ट किया जाएगा। पूरी ट्राइबल कम्युनिटी को एक प्लेटफॉर्म पर लाकर अपनी एकता दिखाई जाएगी और सरकार के सामने किसानों के हक और ज़मीन की सुरक्षा की मांग उठाई जाएगी। इसके अलावा, किसानों ने तय किया कि वे प्रोविंशियल ऑफिसर, डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर, गवर्नर और चीफ मिनिस्टर को लिखकर ज्ञापन देंगे, जिसमें कॉरिडोर, एयरपोर्ट, GIDCs और रेलवे समेत किसानों को प्रभावित करने वाले सभी प्रोजेक्ट्स का विरोध किया जाएगा। मीटिंग के आखिर में गांववालों ने एकमत से कहा कि “किसानों के हक, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और आदिवासियों के वजूद की यह लड़ाई पूरी तरह से नॉन-पॉलिटिकल है। किसान एकजुट रहेंगे और डेमोक्रेसी और गांधीजी के रास्ते पर अपने हक के लिए संघर्ष करेंगे, लेकिन किसी भी कीमत पर अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे।”

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