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बॉम्बे हाई कोर्ट ने पुलिस और सरकार को लताड़ा, ‘पुलिस PM या CM की नौकर नहीं, जनता की नौकर है!’

लोकतंत्र के चौथे पिलर यानी न्यायपालिका से एक ऐतिहासिक और चौंकाने वाला फैसला आया है, जिसने सत्ता के नशे में चूर हुक्मरानों और उनके इशारों पर नाचने वाले पुलिस सिस्टम के होश उड़ा दिए हैं। एक फैसले के दौरान बॉम्बे हाई कोर्ट ने कानून के रखवालों को उनकी असली ताकत दिखाते हुए साफ कहा है कि पुलिस प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की नौकर नहीं, जनता की नौकर है! हाई कोर्ट ने कड़ा हमला बोला है और सवाल उठाया है कि सिर्फ सरकार का विरोध करने पर नागरिकों पर केस क्यों किए जा रहे हैं? क्या देश के लोगों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है?

विरोध नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है: जस्टिस माधव जामदार

इस पूरे मामले पर बॉम्बे हाई कोर्ट के जज जस्टिस माधव जामदार ने गुरुवार को पुलिस सिस्टम की आलोचना की और कहा कि पुलिस किसी शहर या इलाके से लोगों को सिर्फ इसलिए डिपोर्ट नहीं कर सकती क्योंकि उन्होंने सरकार के फैसलों का विरोध किया है या रूलिंग पार्टी के खिलाफ नारे लगाए हैं। जस्टिस जामदार ने कोर्ट में सवाल पूछा कि विरोध हर नागरिक का अधिकार है। अगर पिटीशनर ने ‘BJP सरकार मुर्दाबाद’ या ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाए हैं,

तो नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? ऐसे डेमोक्रेटिक नारे लगाने पर किसी को डिपोर्ट करने का ऑर्डर कैसे दिया जा सकता है?

अगर जनता पेपर लीक के खिलाफ प्रोटेस्ट नहीं करती है तो क्या होगा? सबको गुलाम बनाना बंद करो!

सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के जनरल सेक्रेटरी सईद अहमद के केस की सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने रूलिंग पार्टी की तानाशाही नीतियों पर हमला किया और कहा, देश के सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है। अगर जनता प्रोटेस्ट नहीं कर सकती, आंदोलन नहीं कर सकती, तो क्या हो रहा है? देश में इतने पेपर लीक हो रहे हैं, युवाओं का भविष्य खतरे में है, ऐसे में अगर लोग सड़कों पर उतरकर विरोध करेंगे तो क्या आप उनके खिलाफ केस करेंगे?

हाई कोर्ट ने साफ किया कि सरकार के गलत फैसलों का विरोध करना कोई जुर्म नहीं है और यह किसी को देश से निकालने या देश से निकालने का आधार नहीं हो सकता। हमारा संविधान देश के हर नागरिक को अपनी राय रखने और सम्मान के साथ जीने का बुनियादी अधिकार देता है।
इसी मजबूत आधार पर हाई कोर्ट ने सईद अहमद के खिलाफ जारी एक साल की हिरासत के आदेश को खारिज कर दिया था और पुलिस और प्रशासन दोनों के पक्षपाती आदेशों को रद्द घोषित कर दिया था।

महानगर मेट्रो अखबार उन हुक्मरानों से पूछता है जो सत्ता के बल पर विपक्ष और आम जनता की आवाज दबाने की कोशिश कर रहे हैं, क्या हाई कोर्ट की इस तीखी टिप्पणी के बाद भी आपकी तानाशाही रुकेगी? खाकी वर्दी पहनकर नेताओं की गुलामी करने वाले अधिकारी कब समझेंगे कि उनकी सैलरी जनता के टैक्स के पैसे से आती है, किसी नेता के लालच से नहीं!

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