मोरपंख को लेकर दिए गए बयान से देशभर के लाखों अहिंसक जैन श्रावकों में गहरी पीड़ा और असंतोष व्याप्त है। जैन समाज का मानना है कि अहिंसा और जीवदया उसके मूल सिद्धांत हैं, इसलिए किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाकर धार्मिक कार्यों में उपयोग की कल्पना भी जैन दर्शन के विपरीत है।
भारतीय संस्कृति में मोरपंख का विशेष महत्व रहा है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने मुकुट में मोरपंख धारण करते थे, जो पवित्रता, सौंदर्य और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है। जैन साधु-संतों की परंपरा में भी मोरपंख से निर्मित पिच्छिका का प्रयोग जीवों की रक्षा और अहिंसा की भावना के साथ किया जाता है।
जैन समाज के अनुसार देश में लगभग 1500 श्रमण मुनि हैं और प्रत्येक मुनि वर्ष भर में लगभग 500 से 1000 मोरपंखों से निर्मित पिच्छिका का उपयोग करते हैं। इस आधार पर कुल आवश्यकता लगभग 15 लाख मोरपंखों की होती है। समाज का कहना है कि इस संख्या के आधार पर लाखों मोरों की हत्या या उन्हें प्रताड़ित किए जाने की बात स्वतः ही मिथ्या और तथ्यहीन प्रतीत होती है, क्योंकि एक मोर अपने जीवनकाल में स्वाभाविक रूप से अनेक बार पंख छोड़ता है, जिन्हें परंपरागत रूप से एकत्र किया जाता रहा है।
जैन समाज का मानना है कि किसी भी विषय पर टिप्पणी करने से पहले उसके ऐतिहासिक, धार्मिक और व्यावहारिक पक्षों का समुचित अध्ययन किया जाना चाहिए। करोड़ों लोगों की आस्था और सदियों पुरानी अहिंसक परंपराओं के संबंध में दिए गए वक्तव्यों में संवेदनशीलता और तथ्यात्मक आधार अपेक्षित है।
जैन समाज के लिए मोरपंख किसी हिंसा का नहीं, बल्कि अहिंसा, करुणा और जीवदया का प्रतीक है। इसलिए समाज की भावना है कि बिना पूर्ण तथ्यों के की गई टिप्पणियाँ लाखों अहिंसक श्रावकों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती हैं और ऐसे विषयों पर संवाद तथा तथ्य आधारित विमर्श को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

