दिल्ली अदालत ने 25 साल के आरोपी की जमानत अर्जी खारिज कर दी। उस पर 13 साल की लड़की को अगवा कर सूरत ले जाकर जबरन शादी का आरोप है। अदालत ने कहा कि नाबालिग को भगाने के मामले में आरोपी को जमानत नहीं मिल सकती, कानून के तहत सख्त कार्रवाई होगी।
नाबालिग लड़की के मामले में अदालत का निर्देश
नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली की एक अदालत ने 25 साल के उस व्यक्ति की जमानत अर्जी खारिज कर दी है, जिस पर दिल्ली से 13 साल की लड़की को अगवा करने, उसे सूरत ले जाने और फिर जबरदस्ती शादी करने का आरोप है। अदालत ने इसे लेकर आरोपी पक्ष को दो टूक में कानून समझा दिया। अदालत ने बताया आखिर उसे क्यों जमानत नहीं मिल सकती है।
जमानत नहीं मिलने की वजह
एडिशनल सेशंस जज हरगुरवरिंदर सिंह जग्गी ने कहा कि ऐसे गंभीर अपराधों में नाबालिग की सहमति की कोई कानूनी अहमियत या वैधता नहीं होती है। इसलिए इस मामले में फिलहाल कोई जमानत नहीं मिलेगी। बता दें कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम ( PCMA ), 2006 और भारतीय न्याय संहिता ( BNS ) के अंतर्गत गंभीर आपराधिक मामले दर्ज होते हैं। कानूनन, विवाह के लिए लड़की की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष होनी चाहिए।
अदालत ने पाया कि पीड़िता 17 से 26 फरवरी के बीच आरोपी के साथ रही थी और आरोपों को बेहद परेशान करने वाली घटना बताया, जिसके कारण आरोपी को हिरासत में रखना जरूरी है। लड़की के पिता ने बताया कि 13 साल की लड़की 17 फरवरी को नेब सराय स्थित अपने घर से अपनी मां के काम की जगह के लिए निकली थी, लेकिन न तो वहां पहुंची और न ही वापस लौटी।
लड़की सिंदूर और मंगलसूत्र पहने हुए दिखी थी
पुलिस को पता चला कि यूपी के मैनपुरी का रहने वाला आरोपी मोहित ठाकुर एक कार्यक्रम के सिलसिले में पीड़िता के इलाके में आया था और कथित तौर पर उसे अपने साथ ले गया था। 22 फरवरी को पिता ने ठाकुर के नंबर से मिली एक तस्वीर पेश की, जिसमें लड़की सिंदूर और मंगलसूत्र पहने हुए दिख रही थी। अदालत ने आगे कहा कि यह एक स्थापित सिद्धांत है कि नाबालिग की सहमति या इच्छा की कोई कानूनी अहमियत नहीं होती है।

