मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर युगलपीठ ने एक हत्या के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट की सजा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने दूसरे प्रकरण की FSL रिपोर्ट और गलत दस्तावेजों के आधार पर आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जिसके बाद अपीलकर्ताओं को दोषमुक्त कर दिया गया है।
जबलपुर: मध्य प्रदेश के जबलपुर में हाईकोर्ट ने न्याय का एक बड़ा उदाहरण पेश करते हुए हत्या के एक पुराने मामले में अपीलकर्ताओं को राहत दी है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि निचली अदालत ने बिना पुख्ता सबूतों और लापरवाही के आधार पर आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने इस गंभीर त्रुटि को आधार बनाते हुए दोनों अपीलकर्ताओं की सजा के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है और उन्हें दोषमुक्त कर दिया है।
दूसरे आपराधिक प्रकरण की FSL रिपोर्ट को मान लिया था आधार
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर गहरी हैरानी जताई कि ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में जिसफोरेंसिक साइंस लैबोरेट्री रिपोर्ट का उल्लेख किया है, वह इस केस से संबंधित ही नहीं थी। वह रिपोर्ट किसी अन्य आपराधिक प्रकरण की थी, जिसका इस घटना से कोई लेना-देना नहीं था। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने उसे मुख्य सबूत के तौर पर इस्तेमाल कर लिया। हैरानी की बात यह रही कि मुकदमे के दौरान किसी भी पक्ष ने इस गंभीर गलती पर ध्यान नहीं दिया था।
अपीलकर्ताओं तुलसी राम राजपाल और हर प्रसाद की ओर से पैरवी करते हुए कोर्ट को बताया गया कि घटना के वक्त बिजली बंद थी और रोशनी का कोई साधन नहीं था। इसके अलावा, मामले के चश्मदीद गवाहों के बयान घटना के 15 से 30 दिन बाद दर्ज किए गए थे, जिससे पूरी कहानी संदिग्ध प्रतीत होती है। मेडिकल रिपोर्ट में भी यह सामने आया कि मौत का कारण भारी और नुकीली वस्तु से तिल्ली फटना था, जबकि आरोपी के पास से जब्त चाकू में मानव रक्त नहीं मिला था।
जांच अधिकारी द्वारा एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया और मृतक के अंगूठे के निशान को लेकर भी कई अनसुलझे सवाल खड़े हुए, जिनका संतोषजनक जवाब रिकॉर्ड पर नहीं था।
ट्रायल कोर्ट ने फैसले में जिस FSL रिपोर्ट का इस्तेमाल किया, वह किसी अन्य आपराधिक मामले से जुड़ी थी
घटना के समय बिजली आपूर्ति बंद होने और रोशनी न होने का दावा बचाव पक्ष ने मजबूती से रखा
मृतक के परिजनों और गवाहों के बयानों में काफी देरी और विरोधाभास पाया गया
जांच अधिकारी यह साबित करने में असफल रहे कि एफआईआर किसने और किस आरक्षक के माध्यम से दर्ज की थी
ट्रायल कोर्ट का फैसला सावधानी से नहीं लिखा गया था और केवल इसी आधार पर फैसले को रद्द किया जा सकता है। प्रकरण में अन्य सबूतों का भी गुण-दोष के आधार पर मूल्यांकन करना आवश्यक है। युगलपीठ, जबलपुर हाईकोर्ट

