गुजरात : जब कोई आम नागरिक किसी दुकान से सिर्फ़ 5 रुपये का बिस्किट का पैकेट खरीदता है, तो उस पर मैन्युफैक्चरिंग डेट, एक्सपायरी डेट, वज़न और कंपनी का नाम-पता जैसी सारी डिटेल्स लिखी होती हैं। लेकिन टैक्स के करोड़ों रुपये से बनी सड़कों पर कोई गारंटी या डिटेल्स क्यों नहीं? बारिश में पहले ही बह चुकी और भ्रष्टाचार के गड्ढे में धंसती सड़कों पर जनता कब तक चुप रहेगी?
अब आम नागरिकों की गाढ़ी कमाई से बनी सड़कों की क्वालिटी में ट्रांसपेरेंसी लाने के लिए एक अलर्ट और सख़्त आवाज़ उठी है: हर नई सड़क पर डिजिटल साइनबोर्ड या QR कोड ज़रूरी करो!
सड़कों पर लगने वाले बोर्ड पर ये 5 डिटेल्स ज़रूर होनी चाहिए!
संविधान ने देश के हर नागरिक को यह जानने का अधिकार दिया है कि जनता का पैसा कहाँ और कैसे खर्च हो रहा है। अगर सिस्टम में ट्रांसपेरेंसी रखनी है, तो हर बन रही या नई बन रही सड़क पर एक साफ़ बोर्ड या स्कैन किया जा सकने वाला QR कोड होना चाहिए, जिस पर ये डिटेल्स लिखी हों:
- कॉन्ट्रैक्टर का नाम: सड़क बनाने वाले कॉन्ट्रैक्टर और उसकी एजेंसी की पूरी डिटेल्स।
- इंजीनियर की डिटेल्स: काम की क्वालिटी पास करने वाले ज़िम्मेदार सरकारी इंजीनियर का नाम और कॉन्टैक्ट।
- नेता और अधिकारी: प्रोजेक्ट को मंज़ूरी देने वाले संबंधित मंत्री और बड़े अधिकारियों के नाम।
- प्रोजेक्ट की कुल लागत: जनता के टैक्स से इस सड़क पर कितने करोड़ रुपये खर्च हुए।
- टाइम लिमिट और गारंटी: काम पूरा होने की तारीख और सड़क कितने साल चलनी चाहिए, इसका गारंटी पीरियड।
QR कोड लगेंगे तो ही करप्शन भागेगा!
आज हालत यह है कि सड़कें बनने के कुछ महीनों में ही टूट जाती हैं, लेकिन लोगों को समझ नहीं आता कि इस लापरवाही या करप्शन के लिए किस अधिकारी या कॉन्ट्रैक्टर को ज़िम्मेदार ठहराया जाए! अगर हर सड़क पर ऐसी डिटेल्स पब्लिक हो जाएं, तो:
कॉन्ट्रैक्टर डरेंगे: एक बार खराब काम करने वाले कॉन्ट्रैक्टर का नाम पब्लिक हो जाए, तो उसे ब्लैकलिस्ट करना आसान हो जाएगा।
अफसरों की ज़िम्मेदारी तय होगी: कमीशन लेकर करप्ट काम पास करने वाले इंजीनियर और अधिकारी बच नहीं पाएंगे।
जनता खुद ऑडिट करेगी: कोई भी नागरिक सिर्फ़ अपना मोबाइल स्कैन करके सड़कों की पोल खोल सकेगा।
महानगर मेट्रो से सीधा सवाल: सिस्टम क्यों डरता है?
अगर सरकार और एडमिनिस्ट्रेशन दावा करते हैं कि वे ट्रांसपेरेंट एडमिनिस्ट्रेशन दे रहे हैं, तो कॉन्ट्रैक्टर के नाम और सड़कों पर हुए खर्च का खुलासा करना इतना मुश्किल क्यों है? अगर 5 रुपये का सामान बनाने वाली कंपनी ज़िम्मेदारी ले सकती है, तो करोड़ों के कॉन्ट्रैक्ट लेने वाले और जनता के टैक्स पर गुज़ारा करने वाले अधिकारी अपनी ज़िम्मेदारी से क्यों भाग सकते हैं?
अब समय आ गया है कि जनता जागरूक हो और अपनी सही कमाई का हिसाब मांगे। जब तक सड़कों पर QR कोड और डिटेल्स वाले साइनबोर्ड ज़रूरी नहीं किए जाते, तब तक करप्शन खत्म नहीं होगा!

