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जब ज़िंदगी थी तब तन्हाई थी, अब मौत पर यह भीड़ क्यों? समाज के खोखलेपन पर एक खुला खत!

विशेष वैचारिक लेख, अहमदाबाद:

“जब जिंदा थी… तो अकेली थी…
अब मौत पर.. ये भीड़ कैसी..?”

मानवीय रिश्तों के ढोंग और समाज की झूठी हमदर्दी पर तीखा प्रहार करती ये दो पंक्तियाँ आज हर इंसान की आत्मा को झकझोरने के लिए काफी हैं। हम एक ऐसे दिखावे से भरे समाज में जी रहे हैं, जहाँ इंसान जब तक ज़िंदा रहता है, तब तक उसकी कोई कदर नहीं होती। लेकिन जैसे ही वह इस दुनिया को अलविदा कहता है, पूरा शहर उसकी अर्थी को कंधा देने और उसकी महानता के कसीदे पढ़ने के लिए कतारों में खड़ा हो जाता है। यह कैसा प्रेम है और यह कैसी संवेदना है?

ज़िंदगी भर तन्हाई का जहर, मौत के बाद भीड़ का तमाशा!

आज की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हमारे आसपास ऐसे अनगिनत लोग हैं, जो भीड़ के बीच भी घोर अकेलेपन से जूझ रहे हैं। कोई बुजुर्ग माता-पिता अपने बच्चों के एक फोन की राह तकते-तकते अपनी आँखें हमेशा के लिए मूँद लेते हैं, तो कोई युवा मानसिक तनाव और अकेलेपन से लड़ते-लड़ते अपनी ज़िंदगी की जंग हार जाता है। जब वे ज़िंदा थे, तब उनके पास बैठकर दो मीठे बोल बोलने का समय किसी के पास नहीं था। उन्हें एक कप चाय के लिए पूछने वाला या “आप कैसे हैं?” कहने वाला कोई नहीं था।

लेकिन, जैसे ही उस इंसान की सांसें थम जाती हैं, अचानक रिश्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। सोशल मीडिया पर ‘RIP’ के स्टेटस और बड़ी-बड़ी भावुक पोस्ट्स की बाढ़ आ जाती है। शोक सभाओं और श्मशान में लोगों की भारी भीड़ जुट जाती है। सवाल यह उठता है कि यह हमदर्दी जताने वाली भीड़ तब कहाँ थी, जब वह इंसान ज़िंदा था?

पाखंडी समाज और ‘लोग क्या कहेंगे’ का डर

हकीकत तो यह है कि मौत पर उमड़ने वाली यह भीड़ अक्सर सम्मान या प्रेम की नहीं होती, बल्कि समाज में अपनी झूठी प्रतिष्ठा बनाए रखने और ‘लोग क्या कहेंगे’ के डर की वजह से होती है।

जीते जी उपेक्षा, मौत पर दिखावा: जब इंसान ज़िंदा होता है और उसे सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब सब मुँह फेर लेते हैं।

बेअसर खर्चे: मरने के बाद उस व्यक्ति को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसकी अर्थी के पीछे कितने लोग रो रहे हैं या उसकी अंतिम विदाई कितनी भव्य हो रही है, फिर भी लोग वहाँ दिखावे के लिए लाखों रुपए खर्च करते हैं।

यह हमारे समय की सबसे कड़वी सच्चाई है कि हम इंसान के जाने के बाद उसकी तस्वीर पर महंगे हार चढ़ाते हैं, लेकिन जब तक उसके सीने में दिल धड़क रहा था, हम उसे प्यार का एक छोटा सा तोहफा भी नहीं दे सके।

महानगर मेट्रो का संदेश: समय रहते रिश्तों की कदर करें

यह लेख सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं है, बल्कि हमें अपने व्यवहार को बदलने का आईना दिखाता है। हमारे आसपास, हमारे परिवार या दोस्तों में अगर कोई अकेलापन महसूस कर रहा है, तो उसकी मौत के बाद तमाशा देखने वाली भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय, उसके जीते जी उसके अकेलेपन को दूर करने वाले सच्चे साथी बनिए।

किसी के चले जाने के बाद पछतावा करने से बेहतर है कि जब वह हमारे बीच है, तब उसे गले लगाएँ, उसके साथ वक्त बिताएँ और उसे यह अहसास कराएँ कि वह अकेला नहीं है। क्योंकि, कब्र या श्मशान में दिखाया गया प्रेम कभी प्रेम नहीं हो सकता, वह सिर्फ एक सामाजिक औपचारिकता और दिखावा है।
ज़िंदगी बहुत छोटी है और इंसान बेहद कीमती है। आइए, किसी को जीते जी अकेलेपन के अंधेरे से बाहर निकालें, ताकि किसी के जाने के बाद हमें खुद से यह सवाल न पूछना पड़े कि— “अब मौत पर यह भीड़ कैसी?”

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