सूरत, तारीख : जहां एक तरफ गुजरात हाई कोर्ट सूरत के रांदेर इलाके के नसीरनगर के विवादित ‘घोस्ट डेमोलिशन’ (रातों-रात हुआ गैर-कानूनी तोड़फोड़) के मामले में पुलिस और एडमिनिस्ट्रेशन के अधिकारियों को आड़े हाथों ले रहा था, वहीं दूसरी तरफ चौंकाने वाली बात सामने आई है कि इस पूरे विवाद के सेंटर में रहे सीनियर पुलिस ऑफिसर को राज्य सरकार से बड़ा ‘इनाम’ मिला है। नसीरनगर तोड़फोड़ मामले में विवादों में घिरे सूरत के तत्कालीन DCP नकुम को प्रमोट करने और उन्हें IPS कैडर में नॉमिनेट करने के ऑफिशियल ऑर्डर ने पुलिस फोर्स और पॉलिटिकल सर्कल में काफी चर्चा छेड़ दी है। हाई कोर्ट ने पुलिस की भूमिका पर कड़े सवाल उठाए
गौरतलब है कि सूरत के नसीरनगर में बिना कोई लीगल नोटिस दिए पुलिस फोर्स की मौजूदगी में गरीबों के घर मनमाने ढंग से गिरा दिए गए थे। जब यह मामला गुजरात हाई कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस तरह की गैर-कानूनी तोड़फोड़ निगम अधिकारियों और लोकल पुलिस की मिलीभगत के बिना मुमकिन नहीं है। इस घटना के समय कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार DCP नकुम की भूमिका पर भी कई सवाल उठाए गए और हाई कोर्ट ने सिस्टम की कड़ी आलोचना की।
कोर्ट की फटकार के बीच प्रमोशन का आदेश हैरान करने वाला है
आमतौर पर जब किसी अधिकारी के खिलाफ हाई कोर्ट में कोई गंभीर मामला पेंडिंग होता है या उसके परफॉर्मेंस पर सवाल उठाए जाते हैं तो सरकार उसके प्रमोशन या ट्रांसफर पर रोक लगा देती है या उन्हें होल्ड पर रख देती है। लेकिन इस मामले में इसका उल्टा देखने को मिला है। एक तरफ इस ‘भूत विध्वंस’ को लेकर हाई कोर्ट में पुलिस अधिकारियों की खूब खिंचाई हो रही थी, वहीं गांधीनगर से DCP नकुम के लिए IPS नॉमिनेशन का प्रमोशन लेटर जारी कर दिया गया। सरकार के इस हैरान करने वाले फैसले के बाद सोशल मीडिया से लेकर पीड़ित परिवारों तक में काफी गुस्सा और हैरानी है। अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में हाई कोर्ट के सख्त रुख के बीच इस विवादित प्रमोशन मामले में कोई नया मोड़ आता है या नहीं।

