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सुप्रीम कोर्ट ने TET पर पुनर्विचार अर्जियां खारिज की, 2 साल का वक्त मिला

सुप्रीम कोर्ट ने टीईटी की जरूरत को लेकर दायर पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया है। याचिकाकर्ताओं ने एनसीटीई अधिनियम और 2010 की अधिसूचना का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि मौजूदा शिक्षकों को टीईटी से छूट मिलनी चाहिए।

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की जरूरत को लेकर दायर पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही सेवा में कार्यरत शिक्षकों को टीईटी की योग्यता हासिल करने के लिए 31 अगस्त 2028 तक का समय मिल गया है। याचिकाकर्ताओं ने एनसीटीई अधिनियम और 2010 की अधिसूचना का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि मौजूदा शिक्षकों को टीईटी से छूट मिलनी चाहिए।

प्रमोशन पाने के लिए TET पास करना जरूरी

शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को 2025 के फैसले अंजुमन इशात ए तालीम ट्रस्ट बनाम महाराष्ट्र राज्य के खिलाफ दायर रिव्यू पिटिशनों के समूह को खारिज कर दिया। अपने मूल फैसले में अदालत ने कहा था कि सेवा में कार्यरत स्कूल शिक्षकों के लिए नौकरी जारी रखने और प्रमोशन पाने के लिए टीईटी पास करना जरूरी है।

समय-सीमा 31 अगस्त 2028 तक कर दी

हालांकि, संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए अदालत ने इन-सर्विस शिक्षकों को राहत दी और टीईटी योग्यता प्राप्त करने की समय-सीमा एक साल बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दी।

दलीलों को खारिज कर दिया

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने 30 मई को राज्यों और शिक्षक संगठनों की दलीलों को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि RTE अधिनियम, 2009 और 2017 के संशोधन का असर उन शिक्षकों पर नहीं डाला जा सकता, जिनकी नियुक्ति इन कानूनों के लागू होने से पहले हुई थी। याचिकाकर्ताओं ने एनसीटीई अधिनियम और 2010 की अधिसूचना का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि मौजूदा शिक्षकों को टीईटी से छूट मिलनी चाहिए।

‘टीईटी केवल एक पात्रता शर्त नहीं’

एनसीटीई अधिनियम की धारा 12A का हवाला देने वाली दलील पर अदालत ने कहा कि संरक्षण के साथ निर्धारित समय में योग्यता हासिल करने की शर्त भी लागू रहती है। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि टीईटी केवल एक पात्रता शर्त नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार से जुड़ी एक संवैधानिक जरूरत है।

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