किसानों और ठाकोर समुदाय की जमीन हड़पने का दावा, पुलिस अधिकारियों पर बिल्डरों को संरक्षण देने के आरोप; कार्रवाई नहीं होने पर डीजीपी कार्यालय के घेराव और बड़े जनआंदोलन की चेतावनी
गांधीनगर। खोराज गांव में करीब 150 करोड़ रुपए की जमीन को लेकर विवाद अब राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर तूल पकड़ता जा रहा है। वडगाम से कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी ने गरीब किसानों, ठाकोर समुदाय और स्थानीय लोगों की जमीन कथित रूप से हड़पने के मामले में प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने वडगाम तालुका सेवा सदन पहुंचकर ममलतदार को शिकायत सौंपी और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की। इस दौरान बड़ी संख्या में समर्थक, ग्रामीण और स्थानीय नेता भी मौजूद रहे।
मेवाणी का आरोप है कि गांधीनगर तालुका के खोराज गांव में बाजार मूल्य के हिसाब से करीब 150 करोड़ रुपए की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की गई है। इसके लिए कथित तौर पर जमीन के दस्तावेजों में हेरफेर, फर्जी कागजात तैयार करने और मूल मालिकों पर दबाव बनाने जैसे तरीके अपनाए गए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ प्रभावशाली बिल्डर और जमीन कारोबार से जुड़े लोग गरीब किसानों को उनकी पैतृक जमीन से बेदखल करने का प्रयास कर रहे हैं।
विधायक ने इस मामले में पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ पुलिस अधिकारी जमीन विवाद में प्रभावशाली लोगों को बचाने का प्रयास कर रहे हैं और किसानों पर दबाव बनाया जा रहा है। मेवाणी ने रेंज आईजी और अडालज पुलिस थाने के पुलिस निरीक्षक की भूमिका की भी जांच कराने की मांग की है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
वडगाम में आयोजित जनसभा के दौरान मेवाणी ने सरकार और प्रशासन को चेतावनी दी कि यदि पीड़ित किसानों और स्थानीय समुदायों को न्याय नहीं मिला तो आंदोलन को राज्यव्यापी रूप दिया जाएगा। उन्होंने मांग की कि जमीन के वास्तविक मालिकों के अधिकार सुरक्षित किए जाएं और कथित जमीन घोटाले में शामिल लोगों के साथ-साथ किसी भी दोषी अधिकारी के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई हो।
मेवाणी ने चेतावनी दी कि मांगों पर उचित कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में गांधीनगर स्थित पुलिस महानिदेशक कार्यालय का घेराव किया जाएगा। इसके बाद गांधीवादी तरीके से उत्तर गुजरात सहित पूरे राज्य में बड़ा जनआंदोलन शुरू किया जाएगा।
अब इस मामले में प्रशासन की अगली कार्रवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं। जमीन के दस्तावेजों की जांच, वास्तविक मालिकाना हक का निर्धारण और पुलिस अधिकारियों पर लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष पड़ताल से ही पूरे विवाद की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

