जनता के कर के पैसे से नाश्ते पर भारी खर्च का आरोप, महापौर मायाबेन ने चांदी पड़वा पर्व का दिया हवाला; पार्षदों, पत्रकारों और कर्मचारियों को परोसा गया था नाश्ता
महानगर मेट्रो, सूरत। दक्षिण गुजरात के प्रमुख औद्योगिक शहर सूरत में नगर निगम की सामान्य सभा की बैठक के दौरान भजिये और मिठाई पर हुए खर्च को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। इस बार विवाद शहर के विकास कार्यों, बजट या नागरिक सुविधाओं को लेकर नहीं, बल्कि बैठक में परोसे गए नाश्ते के खर्च को लेकर है। नगर निगम की सामान्य सभा की बैठक में करीब 1 लाख रुपये के भजिये और घारी मंगवाए जाने की जानकारी सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर आम नागरिकों के बीच चर्चा तेज हो गई है। सवाल उठ रहे हैं कि जब आम नागरिक सड़क, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, तब नगर निगम के बजट से नाश्ते पर इतनी बड़ी राशि खर्च करना कितना उचित है।
जानकारी के अनुसार, सूरत नगर निगम की हाल ही में आयोजित सामान्य सभा की बैठक में करीब 31 किलोग्राम भजिये मंगवाए गए थे। इनकी कीमत 750 रुपये प्रति किलोग्राम बताई गई है। इसके अलावा सूरत की प्रसिद्ध पारंपरिक मिठाई घारी भी बैठक में शामिल लोगों के लिए मंगवाई गई थी। भजिये और घारी पर हुए खर्च का मामला सामने आने के बाद नगर निगम के कामकाज और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
इस पूरे मामले में सबसे अधिक चर्चा 31 किलो भजिये की मात्रा और उनके खर्च को लेकर हो रही है। नगर निगम की बैठक में पार्षदों के अलावा अधिकारी, कर्मचारी और अन्य आमंत्रित लोग भी मौजूद रहते हैं। ऐसे में बैठक के दौरान नाश्ते की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि आखिर सार्वजनिक धन से इस तरह के खर्च की आवश्यकता क्यों पड़ी।
विवाद बढ़ने के बाद सूरत की महापौर मायाबेन ने सामने आकर इस खर्च का बचाव किया। उन्होंने बताया कि जिस दिन बैठक आयोजित की गई थी, उस दिन चांदी पड़वा का पर्व था। इसी अवसर पर बैठक में मौजूद लोगों को पारंपरिक रूप से घारी और भजिये परोसे गए थे। महापौर के अनुसार, करीब 31 किलोग्राम भजिये मंगवाए गए थे, जिनकी दर 750 रुपये प्रति किलोग्राम थी।
महापौर ने यह भी स्पष्ट किया कि नाश्ते की व्यवस्था केवल पार्षदों के लिए नहीं थी, बल्कि बैठक में मौजूद पत्रकारों, नगर निगम के कर्मचारियों और अन्य सभी लोगों को भी सद्भावना के तौर पर नाश्ता परोसा गया था। उनका कहना है कि यह आयोजन पर्व के अवसर पर पारंपरिक खानपान की व्यवस्था के तहत किया गया था।
हालांकि, महापौर की सफाई के बावजूद विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर नागरिकों और विपक्षी हलकों में सवाल उठाए जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि नगर निगम का बजट मूल रूप से शहर के विकास, सफाई व्यवस्था, पेयजल, सड़क और अन्य नागरिक सुविधाओं पर खर्च होना चाहिए। ऐसे में बैठकों और आयोजनों में होने वाले खर्च की पारदर्शिता भी जरूरी है।
अब इस पूरे मामले में सवाल यह है कि नगर निगम की बैठकों में होने वाले खानपान और अन्य व्यवस्थाओं पर खर्च की क्या सीमा निर्धारित है और इस खर्च को किस मद से पूरा किया गया। चांदी पड़वा पर्व के नाम पर किए गए इस आयोजन को लेकर महापौर ने अपनी सफाई दे दी है, लेकिन सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर उठे सवालों ने सूरत नगर निगम को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

