सिर्फ नाम की पार्टियां और करोड़ों कमाने का खेल: गुजरात की टॉप पार्टियों के करोड़ों रुपये के ब्लैक मनी अकाउंट सामने आने से पॉलिटिक्स में भूचाल आ गया है।
पिछले कुछ समय से भारतीय लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया में ट्रांसपेरेंसी लाने की बहुत बातें हो रही हैं, लेकिन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की एक हालिया रिपोर्ट ने उजागर किया है कि जमीनी हकीकत कितनी गड़बड़ और संदिग्ध है। फाइनेंशियल ईयर 2024-25 के दौरान रजिस्टर्ड लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को मिले पैसे के बारे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इस बात पर गंभीर सवाल उठे हैं कि इन पार्टियों को, खासकर गुजरात के नाम पर या गुजरात से जुड़ी पार्टियों को करोड़ों-अरबों रुपये का फंड कैसे मिला और यह पैसा कहां से आया। चुनाव आयोग की किताबों में दर्ज आंकड़ों ने उड़ा दी नींद
ADR और चुनाव आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर आप साल 2024-25 में गुजरात में एक्टिव या कागजों पर चल रही गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को मिले फंड और डोनेशन के आंकड़े देखेंगे, तो आपके होश उड़ जाएंगे। आम जनता चुनाव के दौरान एक-एक रुपये के लिए परेशान रहती है, जबकि इन छोटी या अनजान पार्टियों के अकाउंट में करोड़ों रुपये डाले गए हैं।
ऑफिशियल आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात की टॉप गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों की इनकम के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे इस तरह हैं:
न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी: 699 करोड़ रुपये
सत्यवादी रक्षक पार्टी: 416 करोड़ रुपये
सौराष्ट्र जनता पक्ष: 211 करोड़ रुपये
भारतीय राष्ट्रीय जनता दल: 199 करोड़ रुपये
जन मन पार्टी: 133.56 करोड़ रुपये
स्वतंत्र प्रकाश पार्टी: 75 करोड़ रुपये
अरबों रुपये के इस फंड के पीछे क्या राज है? क्यों गंभीर सवाल उठे हैं? ये आंकड़े आम नहीं हैं, लेकिन ये डेमोक्रेसी की आड़ में खेले जा रहे सबसे बड़े फाइनेंशियल गेम की ओर इशारा करते हैं। पॉलिटिकल एनालिस्ट और इकोनॉमिस्ट हैरान हैं कि अचानक ऐसी पार्टियों को सैकड़ों करोड़ रुपये कौन डोनेट कर रहा है जिनका ज़मीन पर कोई नाम नहीं है, चुनावों में कोई बड़े पब्लिक मेंबर या बड़े लीडर नहीं हैं, कोई मास मूवमेंट या पॉपुलैरिटी नहीं है? अगर हम इन पार्टियों के इनकम और एक्सपेंडिचर अकाउंट देखें, तो यह साफ हो जाता है कि यह सिर्फ कागज़ पर चलने वाली कंपनियों या शेल कंपनियों की तरह हवाला/ब्लैक मनी को व्हाइटवॉश करने का खेल तो नहीं है? यह शक बढ़ रहा है कि इन अनरिकॉग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टियों को इलेक्शन फंडिंग रूल्स की आड़ में ब्लैक मनी को लॉन्ड्र करने के लिए ‘सेफ हेवन’ के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
इलेक्शन मशीनरी और एजेंसियों की भूमिका शक के दायरे में जब देश में ट्रांसपेरेंट पॉलिटिक्स की बात हो रही है, तो इस तरह से अनजान सोर्स से करोड़ों रुपये लेने वाली पार्टियों के खिलाफ कोई सख्त एक्शन क्यों नहीं लिया जा रहा है? आम ट्रेडर्स और नागरिकों पर टैक्स और GST लगाया जाता है, लेकिन इन पॉलिटिकल पार्टियों के नाम पर आने वाले करोड़ों रुपये के ट्रांजैक्शन पर कौन सी एजेंसी नज़र रखती है? ‘पाको गुजरात’ अखबार साफ तौर पर मांग करता है कि इन सभी गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों के बैंक अकाउंट्स, उनके डोनर्स की असली पहचान और उनके खर्चों की सेंट्रल जांच एजेंसियों (ED/इनकम टैक्स) से ट्रांसपेरेंट जांच कराई जाए। अगर इस मामले में पूरी जांच नहीं की गई, तो लोकतंत्र के पवित्र मंदिर को कमर्शियल दुकानों में बदलने वाले इन लोगों को कभी नहीं रोका जा सकेगा। लोगों के अधिकारों और देश की इकॉनमी के इस खुलेआम शोषण को रोकना अब बहुत ज़रूरी हो गया है।

