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सुप्रीम कोर्ट में बड़ा धमाका: पूर्व जस्टिस कौल की आत्मकथा ‘विदाउट फियर ऑफ फेवर’ से न्यायपालिका में भूचाल, CJI चंद्रचूड़ पर सरकार के प्रति नरम रुख और कॉलेजियम की गरिमा को धूमिल करने के गंभीर आरोप

देश की सर्वोच्च न्यायपालिका और सरकार के अंदरूनी रिश्तों के बंद दरवाजों के पीछे के काले सच अब सड़कों पर आ गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल की आत्मकथा ‘विदाउट फियर ऑफ फेवर’ ने पब्लिश होते ही देश भर के कानूनी और राजनीतिक हलकों में खूब चर्चा बटोरी है। इस किताब ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसने न्यायिक व्यवस्था की नींव हिला दी है।

CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ पर गंभीर आरोप

जस्टिस संजय किशन कौल ने अपनी आत्मकथा में बेहद चौंकाने वाले और जानलेवा खुलासे किए हैं। उनके दावे के मुताबिक, देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. जजों की नियुक्ति जैसे बहुत सेंसिटिव मामलों में चंद्रचूड़ ने हमेशा सरकार के प्रति नरम रुख अपनाया। इतना ही नहीं, उन्होंने यह पक्का करने की भी लगातार कोशिश की कि सरकार के पक्ष में फैसला हो।

जजों की नियुक्ति के लिए संवैधानिक रूप से गठित कॉलेजियम की फॉर्मल मीटिंग से पहले ही, उस समय के CJI चंद्रचूड़ सरकार के साथ अनौपचारिक रूप से समझौते पर पहुंचने की निजी कोशिशें करते थे। कॉलेजियम की चर्चा से पहले सरकार को मौका देने के इस तरीके ने सुप्रीम कोर्ट और पूरी ज्यूडिशियरी की गरिमा को बहुत ठेस पहुंचाई है।

दिसंबर 2023 में रिटायर हुए जस्टिस कौल का बड़ा खुलासा

दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए जस्टिस संजय किशन कौल ने लिखा है कि सरकार के साथ समझौते पर पहुंचने के इस अजीब और खतरनाक तरीके को लेकर उनके और CJI चंद्रचूड़ के बीच तीखे मतभेद थे।

जस्टिस कौल ने किताब में साफ चेतावनी देते हुए लिखा है कि कॉलेजियम की फॉर्मल मीटिंग से पहले सरकार के साथ अनौपचारिक सलाह-मशविरा देश को बहुत खतरनाक मैसेज देता है। इतिहास गवाह है कि जब भी ज्यूडिशियरी कमजोर होती है या सरकार के खिलाफ झुकती है, तो सत्ता में बैठी पॉलिटिकल पार्टियां और सरकारें अपनी मनमानी करने की पूरी कोशिश करती हैं और संवैधानिक ऑटोनॉमी की बलि दी जाती है।

ज्यूडिशियरी की ऑटोनॉमी के लिए एक बड़ा खतरा

इस खुलासे के बाद अब पूरे देश में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या देश का सुप्रीम कोर्ट अपनी आजादी खो रहा है? अगर जजों की नियुक्ति जैसे अहम फैसलों में भी सरकार का दखल या अनौपचारिक सहमति ली जाती है, तो आम नागरिक ज्यूडिशियरी से निष्पक्ष न्याय की उम्मीद कैसे कर सकता है?

पूर्व जस्टिस संजय किशन कौल की इस किताब ने ज्यूडिशियरी, कॉलेजियम सिस्टम और सरकार के रिश्तों पर ऐसा काला दाग लगाया है कि इसका जवाब देना ज्यूडिशियरी और उस समय के CJI चंद्रचूड़ दोनों के लिए बहुत मुश्किल होगा। पक्को गुजरात न्यूज़ इस पूरे मामले पर आपको लेटेस्ट अपडेट देता रहेगा।

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