महज 35 करोड़ में होने वाला काम, 140 करोड़ में क्यों? बाजार मूल्य से 4 गुना अधिक भुगतान पर उठे गंभीर सवाल
प्रदेश की 14,085 राशन दुकानों की ई-पॉस मशीनों की खरीद में खुली वित्तीय धांधली, 91.78 करोड़ का भुगतान डकार चुकी है सरकार
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के दाम और सरकारी बिलों के आंकड़ों में जमीन-आसमान का फर्क, जनता की गाढ़ी कमाई की खुली लूट
छत्तीसगढ़ में गरीबों के कल्याण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को पारदर्शी और डिजिटल बनाने के नाम पर एक बहुत बड़ा वित्तीय खेल चल रहा है। राशन की दुकानों पर भ्रष्टाचार रोकने के लिए लगाई गई बायोमीट्रिक ई-पॉस (e-POS) मशीनें अब खुद भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियंत्रित लूट का सबसे बड़ा अड्डा बन गई हैं। हाल ही में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़ों ने यह साबित कर दिया है कि कैसे सरकारी महकमों में फाइलों के खेल और मिलीभगत से जनता
के टैक्स के पैसों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
तथ्यों का काला चिट्ठा: 35 करोड़ का प्रोजेक्ट 140 करोड़ तक कैसे पहुंचा?
यदि इस पूरी खरीद प्रक्रिया का गणित बाजार के वास्तविक रेट के आधार पर लगाया जाए, तो सरकारी तंत्र के कारनामे किसी बड़े घोटाले की कहानी बयां करते हैं:
बाजार की असली कीमत: औद्योगिक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स जैसे इंडियामार्ट (IndiaMART) और ट्रेडइंडिया (TradeIndia) पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, VA-21 मॉडल की अत्याधुनिक 4G बायोमीट्रिक ई-पॉस मशीनों की थोक बाजार कीमत महज 13,000 से 15,000 रुपए प्रति नग है।
गणित का कच्चा चिट्ठा: यदि सबसे अधिकतम कीमत यानी प्रति मशीन 15,000 रुपए भी मान ली जाए, तो छत्तीसगढ़ की कुल 14,085 राशन दुकानों के लिए मशीनें खरीदने का कुल खर्च सिर्फ 21.12 करोड़ रुपए होता है।
डेटा खर्च का हिसाब: इन मशीनों के सुचारू संचालन के लिए पांच साल की 4G इंटरनेट डेटा सर्विस का भारी-भरकम खर्च भी जोड़ लिया जाए (जो कि लगभग 13.35 करोड़ रुपए बैठता है), तो भी इस पूरी योजना की कुल वास्तविक लागत अधिकतम 35 करोड़ रुपए से ज्यादा नहीं होनी चाहिए थी।
लेकिन इसके उलट, सरकार इन मशीनों और इसकी सेवाओं की एवज में कुल 140 करोड़ रुपए का भारी-भरकम भुगतान कर रही है। यानी बाजार मूल्य से लगभग चार गुना अधिक राशि खर्च करके सरकारी खजाने को जानबूझकर चूना लगाया गया है।
चार साल में 91.78 करोड़ स्वाहा, 48 करोड़ का भुगतान अभी बाकी
घोटाले की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश की राशन दुकानों में इन मशीनों को स्थापित करने के बाद पिछले चार वर्षों के भीतर ही सरकारी खजाने से 91.78 करोड़ रुपए का भुगतान संवेदक या संबंधित एजेंसियों को किया जा चुका है। खेल यहीं खत्म नहीं होता, अभी भी लगभग 48 करोड़ रुपए का भुगतान किया जाना बाकी है। इतने बड़े पैमाने पर हो रही अंधाधुंध फिजूलखर्ची से साफ जाहिर होता है कि बिचौलियों और भ्रष्ट तंत्र की सांठगांठ से गरीबों के नाम पर किस तरह सरकारी तिजोरी खाली की जा रही है।
पारदर्शिता के नाम पर फरेब: नीतियों और वित्तीय प्रबंधन पर बड़े सवाल
राज्य सरकार हमेशा से यह दावा करती आई है कि PDS प्रणाली में पारदर्शिता लाने और लीकेज रोकने के लिए बायोमीट्रिक व्यवस्था अनिवार्य की गई है, लेकिन जिस तरह से इस तकनीक को खरीदने में खुलेआम भ्रष्टाचार की बू आ रही है, उसने सरकार के दावों की हवा निकाल दी है।
क्या छत्तीसगढ़ के जिम्मेदार अधिकारियों ने बाजार की वास्तविक कीमतों की अनदेखी करके चुनिंदा एजेंसियों को फायदा पहुँचाने के लिए यह टेंडर पास किया?
क्या इस वित्तीय हेरफेर की उच्चस्तरीय न्यायिक या निष्पक्ष जांच करवाकर दोषियों की जवाबदेही तय की जाएगी?
महानगर मेट्रो की यह पड़ताल साफ इशारा करती है कि गरीबों के राशन में से पारदर्शिता के नाम पर जो भ्रष्टाचार का दीमक लग रहा है, वह आने वाले समय में एक बहुत बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक भूचाल ला सकता है।

