जाति और धर्म की आग में देश को झोंककर ‘विकसित भारत’ का ढोंग क्यों?
कुर्सी की लालसा और सत्ता के स्वार्थ के लिए सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करती राजनीतिक पार्टियां
नफरत के बाजार में जन कल्याण और प्रगति की उम्मीद करना सिर्फ और सिर्फ एक मूर्खतापूर्ण धोखा
देश की आजादी के सौ साल पूरे होने पर भारत को एक आर्थिक महाशक्ति और ‘विकसित राष्ट्र’ बनाने का भव्य सपना इन दिनों सत्ता के गलियारों से लेकर विज्ञापनों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स तक गूंज रहा है। ‘विकसित भारत 2047’ का यह नारा देश के युवाओं और नागरिकों के मन में एक उम्मीद जगाने के लिए गढ़ा गया है, लेकिन क्या यह महज एक चुनावी जुमला बनकर रह गया है? सवाल यह नहीं है कि भारत 2047 में कैसा दिखेगा, सवाल यह है कि जिस देश की राजनीति की बुनियाद ही नफरत, फूट और वैमनस्य पर टिकी हो, वहाँ प्रगति की कल्पना करना भी किसी फरेब से कम है क्या?
सियासी स्वार्थ: जातियों की दीवारें और धर्मों की खाई
आज देश की राजनीतिक व्यवस्था का कड़वा सच यह बन चुका है कि सत्ता की मलाई और कुर्सी की लालसा पाने के लिए सियासी दल किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। जिस देश में राजनीति का मुख्य हथियार जनता का विकास न होकर दो जातियों के बीच जातिगत जहर फैलाना, और दो धर्मों के बीच वैमनस्य की आग सुलगना हो, वहाँ समाज का ढांचा अंदर से खोखला हो जाता है।
वोटों की फसल काटने के लिए जातियों को आपस में लड़ाया जाता है।
ध्रुवीकरण की राजनीति के तहत धर्म के नाम पर इंसानों को बांटा जाता है।
एक सुनियोजित एजेंडे के तहत समाज के ताने-बाने को तार-तार किया जाता है ताकि राजनीतिक रोटियां सेंकी जा सकें।
ऐसी विभाजनकारी मानसिकता और नफरत की राजनीति करने वाले दलों से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे देश को प्रगति के रास्ते पर ले जाएंगे? यह एक ऐसा विरोधाभास है जो सीधे तौर पर जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है।
विकास का ढोंग और जन कल्याण की बलि
जो राजनीतिक दल समाज को जोडऩे के बजाय तोडऩे का काम करते हैं, उनके मुंह से ‘जन कल्याण’ और ‘विकास’ जैसे शब्द बेहद शोभाहीन और छलावे जैसे लगते हैं। जिस देश की ऊर्जा युवाओं को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं देने में लगनी चाहिए, वह ऊर्जा सिर्फ इस बात में खर्च की जा रही है कि कैसे एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा करके चुनाव जीता जाए।
जब सत्ता का एकमात्र उद्देश्य केवल और केवल चुनाव जीतना और अपनी हुकूमत बचाए रखना रह जाता है, तब देश का आम नागरिक हाशिए पर चला जाता है। महंगाई, बेरोजगारी, बदहाल शिक्षा और चरमराती स्वास्थ्य सेवाएं इन स्वार्थी नेताओं के एजेंडे में कहीं दूर-दूर तक नहीं होतीं। इसके बजाय, एजेंडे में सिर्फ नफरत, बयानबाजी और ध्रुवीकरण के नए पैंतरे होते हैं।
निष्कर्ष: क्या नफरत के रथ पर सवार होकर ‘विकसित भारत’ पहुंचा जा सकता है?
इतिहास गवाह है कि कोई भी राष्ट्र तब तक महान या विकसित नहीं बन सकता, जब तक उसके नागरिक आपस में भाईचारे और एकता के सूत्र में बंधे न हों। जिस देश की राजनीति का आधार ही ‘बांटो और राज करो’ (Divide and Rule) की नीति बन चुका हो, वहाँ 2047 के विकसित भारत का सपना सिर्फ एक
कागजी जुमला और मीठी गोलियों के सिवाय कुछ नहीं है।
अब समय आ गया है कि देश का मतदाता, युवा और आम इंसान इन राजनीतिक दलों के जाति और धर्म के पाखंड को पहचाने। जब तक जनता नफरत की
इस राजनीति को सिरे से नकार कर विकास, रोजगार और असल मुद्दों पर वोट नहीं करेगी, तब तक ‘विकसित भारत’ का यह जुमला केवल सत्ता की तिजोरी भरने का जरिया ही बनता रहेगा।
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