एक तरफ कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी देश भर में युवाओं और जेन-ज़ी से जुड़ने के लिए नई रणनीतियां बना रहे हैं, तो दूसरी तरफ गुजरात में कांग्रेस की वास्तविकता बिल्कुल विपरीत और दयनीय तस्वीर पेश कर रही है। गुजरात में यूथ कांग्रेस के पदाधिकारी और युवा कार्यकर्ता निराश होकर इस्तीफे दे रहे हैं। पिछले 30 सालों से एक ही विफल चेहरों और पुरानी विचारधारा वाले नेताओं के हाथों में उलझी गुजरात कांग्रेस अगर अपना अस्तित्व बचाना चाहती है, तो अब अमूल-चूल परिवर्तन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
ए.सी. केबिनों के नेतृत्व से जमीनी राजनीति नहीं होती!
गुजरात में विपक्ष के रूप में कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही है कि उसके ज्यादातर नेता सिर्फ एसी केबिनों में बैठकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने या सोशल मीडिया पर बयान देने तक ही सीमित हो गए हैं। जमीनी पकड़ का अभाव: सरकार की नीतियों, भर्ती घोटालों, महंगाई या प्रशासनिक अनियमितताओं के खिलाफ जनता में आक्रोश तो है, लेकिन इस आक्रोश को जन-आंदोलन में बदलने में कांग्रेस का नेतृत्व पूरी तरह विफल रहा है। पुराने चेहरों से जनता ऊबी: जिन नेताओं के नेतृत्व में पार्टी लगातार चुनाव हारती आ रही है, उन्हीं चेहरों को बार-बार आगे करके प्रदेश का नेतृत्व सौंपा जाता है। इससे आम मतदाताओं और युवाओं में कोई नया उत्साह पैदा नहीं होता।
गुजरात कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का एकमात्र रास्ता: यूथ और नए चेहरे
अगर गुजरात में कांग्रेस को सही मायने में पुनर्जीवित करना है और भविष्य उज्ज्वल बनाना है, तो दिल्ली हाईकमान को कड़े फैसले लेकर खास रणनीति अपनानी होगी: नए और युवा चेहरों को कमान: प्रदेश अध्यक्ष से लेकर संगठन के मुख्य पदों पर पुराने और स्थापित हित रखने वाले नेताओं की जगह ऐसे युवा नेताओं को जिम्मेदारी सौंपनी होगी जो युवाओं और मतदाताओं के साथ सीधा संवाद साध सकें। सिर्फ इस्तीफे नहीं, स्थान: यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को सिर्फ चुनावों में बैनर लगाने तक इस्तेमाल करने के बजाय उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में जगह देनी होगी, ताकि इस्तीफों का दौर रुके। सड़क पर आंदोलन: जनता के मुद्दों के लिए एसी कमरे से बाहर निकलकर गर्मी की धूप में और सड़कों पर उतरकर लड़ाई लड़नी होगी।
महानगर मेट्रो का तीखा सुर
चुनाव सिर्फ अतीत के इतिहास पर नहीं जीते जाते, बल्कि वर्तमान में जनता के साथ जुड़ाव से जीते जाते हैं। अगर दिल्ली हाईकमान और गुजरात कांग्रेस समय रहते जागकर अपने संगठन में “युवा क्रांति” नहीं लाएंगे, तो 30 साल का वनवास कभी खत्म नहीं होगा। गुजरात के युवाओं और जनता को आज एक आक्रामक, जमीनी और नया विपक्ष चाहिए – न कि एसी केबिन में बैठकर राजनीति करने वाले पुराने चेहरे!

