राजकोट में पुलिस व्यवस्था को लेकर गंभीर आरोपों से मचा हड़कंप, नागरिकों ने उच्चस्तरीय जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की
राजकोट पुलिस तंत्र के कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों पर वर्दी की आड़ में कथित तौर पर नागरिकों से वसूली करने, जमीन-जायदाद के विवादों में हस्तक्षेप करने और शिकायतों के निपटारे के नाम पर आर्थिक लेन-देन करने जैसे गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप लगाने वाले नागरिकों का कहना है कि वे न्याय की उम्मीद में पुलिस थानों तक पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें राहत मिलने के बजाय कथित रूप से दबाव और आर्थिक सौदेबाजी का सामना करना पड़ता है।
इस पूरे मामले ने पुलिस की कार्यप्रणाली और आम नागरिकों के अधिकारों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।
च के नाम पर कथित वसूली और संपत्ति सौदों में हस्तक्षेप
आरोप है कि राजकोट में कुछ मामलों में नागरिकों द्वारा दी गई शिकायतों और आवेदनों को लंबे समय तक लंबित रखा जाता है। इसके बाद कथित तौर पर दूसरे पक्ष के साथ समझौते या आर्थिक लेन-देन के रास्ते तलाशे जाते हैं।
कुछ नागरिकों का दावा है कि पुलिसकर्मी जांच अधिकारी की भूमिका से आगे बढ़कर जमीन और संपत्ति से जुड़े मामलों में मध्यस्थ की तरह काम करते हैं। आरोप तो यहां तक लगाए गए हैं कि कुछ मामलों में विवादित संपत्तियों के सौदों में तीसरे पक्ष को शामिल कर आर्थिक लाभ उठाने की कोशिश की गई।
यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह पुलिस की निष्पक्षता और कानून के शासन पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।
सिविल मामलों में पुलिस के हस्तक्षेप पर भी सवाल
इस मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि कुछ संपत्ति और सिविल विवादों में पुलिस द्वारा कथित तौर पर दबाव बनाया जाता है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि उन्हें पुलिस कार्रवाई, हिरासत या जेल भेजने का डर दिखाकर समझौते के लिए मजबूर किया जाता है।
कानूनी जानकारों के अनुसार, महज सिविल विवाद होने की स्थिति में पुलिस की भूमिका और अधिकार कानून के दायरे में ही होने चाहिए। ऐसे मामलों में यदि किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से धमकाया या दबाव में लाया जाता है तो उसकी जांच आवश्यक है।
शिकायत दर्ज करने के बजाय कथित तौर पर सौदेबाजी?
आरोपों के अनुसार, कुछ मामलों में शिकायत मिलने के बाद तुरंत कानूनी कार्रवाई करने के बजाय यह तय करने की कोशिश की जाती है कि मामले को कथित रूप से किस तरह ‘समझौते’ के जरिए खत्म किया जा सकता है।
नागरिकों का दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया में कुछ कथित बिचौलिये भी सक्रिय रहते हैं, जो शिकायतकर्ता और पुलिस अधिकारियों के बीच संपर्क का काम करते हैं।
इन आरोपों की सच्चाई सामने लाने के लिए शिकायतों, पुलिस रिकॉर्ड, कॉल विवरण, सीसीटीवी फुटेज और संबंधित संपत्ति दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
जमीन के विवादों में करोड़ों के लेन-देन के आरोप
कुछ शिकायतकर्ताओं ने गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि संपत्ति विवादों को सुलझाने के नाम पर जमीन या प्लॉट के सौदों में हस्तक्षेप किया गया और करोड़ों रुपये के लेन-देन में कथित रूप से हिस्सेदारी लेने की कोशिश हुई।
आरोप यह भी हैं कि जब मूल शिकायतकर्ता अपने पैसे या संपत्ति से जुड़े अधिकारों की मांग करते हैं तो उन्हें कथित तौर पर झूठे मुकदमे में फंसाने या कड़े कानूनों के तहत जेल भेजने की धमकी दी जाती है।
यदि इस तरह की कोई घटना प्रमाणित होती है तो मामला केवल भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पद के दुरुपयोग और नागरिकों के अधिकारों के उल्लंघन की दिशा में भी गंभीर जांच का विषय बन सकता है।
खाकी के पीछे कथित वसूली तंत्र?
राजकोट में पहले भी पुलिस से जुड़े विवाद और भ्रष्टाचार के आरोप चर्चा में रहे हैं। ऐसे में ताजा आरोपों ने एक बार फिर पुलिस व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है।
आम नागरिकों का सवाल है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी शिकायत लेकर पुलिस थाने जाता है और वहीं उसे कथित तौर पर आर्थिक दबाव का सामना करना पड़े, तो वह न्याय के लिए आखिर किस दरवाजे पर जाए?
हालांकि, किसी भी पुलिस अधिकारी या कर्मचारी को इन आरोपों के आधार पर दोषी मानने से पहले निष्पक्ष जांच और ठोस सबूत जरूरी हैं।
उच्च अधिकारियों से निष्पक्ष जांच की मांग
मामले को लेकर अब मांग उठ रही है कि राजकोट पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच कराएं। साथ ही, यदि किसी पुलिसकर्मी, अधिकारी या बिचौलिए की संलिप्तता सामने आती है तो उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून और अन्य लागू कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाए।
नागरिकों और कानून के जानकारों का कहना है कि पुलिस का काम कानून लागू करना है, न कि निजी संपत्ति विवादों को आर्थिक सौदों में बदलना। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और यदि कोई दोषी है तो उसके खिलाफ कितनी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

