Homeभारतगुजरातकोचिंग क्लास की गाइडलाइन या ‘व्यवस्था’ की गंगोत्री? ट्यूशन संचालकों को बचाने...

कोचिंग क्लास की गाइडलाइन या ‘व्यवस्था’ की गंगोत्री? ट्यूशन संचालकों को बचाने के लिए नियमों में बड़े खेल का आरोप

अहमदाबाद। शिक्षा और विद्यार्थियों की सुरक्षा के नाम पर तैयार किए गए नए मसौदा दिशा-निर्देशों को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। क्या प्रस्तावित नियम वास्तव में विद्यार्थियों के हित और सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं या फिर बड़े कोचिंग संस्थानों को राहत देने के लिए नियमों में बदलाव किया जा रहा है? मसौदे को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं और नियम तैयार करने की प्रक्रिया में कथित तौर पर बड़े स्तर पर ‘व्यवस्था’ किए जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन प्रस्तावित प्रावधानों को लेकर अभिभावकों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच बहस तेज हो गई है।

5 से 8 घंटे की कोचिंग पर सवाल

मसौदे में कोचिंग क्लास के संचालन और पढ़ाई के घंटों से जुड़े प्रावधानों को लेकर सबसे अधिक सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि बच्चों की उम्र, मानसिक स्थिति और शारीरिक क्षमता को ध्यान में रखते हुए पढ़ाई का समय संतुलित होना चाहिए।

यदि किसी विद्यार्थी को स्कूल के लगभग छह घंटे के बाद कोचिंग में भी पांच से आठ घंटे तक बैठना पड़े, तो उसके पास खेलकूद, पर्याप्त नींद, आराम और स्व-अध्ययन के लिए कितना समय बचेगा, यह बड़ा सवाल है।

आलोचकों का सवाल है कि बच्चों पर इतना अधिक पढ़ाई का बोझ डालने की अनुमति देने से उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा। साथ ही यह भी पूछा जा रहा है कि लंबे समय तक कोचिंग चलाने की व्यवस्था से आखिर किसे लाभ होगा।

16 साल के बजाय 14 साल में प्रवेश का मुद्दा

कोचिंग में प्रवेश की न्यूनतम आयु को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ है। आलोचकों के अनुसार केंद्र सरकार के मसौदा दिशा-निर्देशों में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कोचिंग संस्थानों में प्रवेश देने पर रोक का प्रावधान था, ताकि कम उम्र में विद्यार्थियों पर प्रतियोगी परीक्षाओं का अनावश्यक दबाव न पड़े।

अब यदि प्रवेश की आयु सीमा 16 वर्ष से घटाकर 14 वर्ष करने का प्रावधान किया जाता है, तो इसके पीछे का तर्क स्पष्ट किया जाना चाहिए। सवाल यह है कि 14 वर्ष की उम्र के बच्चों को प्रतियोगी परीक्षा आधारित कोचिंग के बढ़ते दबाव में लाने से उनके मानसिक विकास और बचपन पर क्या असर पड़ेगा।

आलोचकों ने इस बदलाव को शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण से जोड़ते हुए सरकार से स्पष्ट जवाब और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग की है।

शिकायत व्यवस्था को लेकर भी उठे सवाल

मसौदे को लेकर एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल अभिभावकों और नागरिकों की शिकायत व्यवस्था से जुड़ा है। यदि कोई कोचिंग संचालक नियमों का उल्लंघन करता है, मनमानी फीस वसूलता है या विद्यार्थियों की सुरक्षा के मानकों का पालन नहीं करता, तो अभिभावक आसानी से शिकायत कहां और कैसे दर्ज कराएंगे, यह व्यवस्था स्पष्ट और सरल होना जरूरी है।

अभिभावकों और जागरूक नागरिकों के लिए ऑनलाइन तथा ऑफलाइन शिकायत दर्ज कराने की आसान व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही शिकायतों का निश्चित समयसीमा के भीतर निपटारा सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

नियमों को लेकर सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग

प्रस्तावित दिशा-निर्देशों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच शिक्षा मंत्री और मुख्यमंत्री से मामले की गंभीरता से समीक्षा करने की मांग की जा रही है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि नियम तैयार करने की प्रक्रिया में यदि किसी प्रकार की अनियमितता या मिलीभगत हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

शिक्षा को पूरी तरह व्यावसायिक दबाव में जाने से रोकने और विद्यार्थियों के हितों की रक्षा के लिए ऐसे नियम बनाए जाने की मांग की जा रही है, जिनमें बच्चों की उम्र, स्वास्थ्य, पढ़ाई का संतुलन, फीस की पारदर्शिता और अभिभावकों की शिकायतों के त्वरित समाधान को प्राथमिकता मिले।

फिलहाल मसौदे को लेकर उठ रहे आरोपों और सवालों पर अंतिम स्थिति सरकार के आधिकारिक निर्णय और नियमों के अंतिम रूप के बाद ही स्पष्ट होगी।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments