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राजकोट में शराब पार्टी पर रेड और अब…?: क्या गुजरात में शराब बैन सिर्फ़ कागज़ों पर है या कानून सिर्फ़ गरीबों के लिए है? उठ रहे सवाल और लोगों में गुस्सा

हाल ही में कल्चरल शहर माने जाने वाले राजकोट में एक हाई-प्रोफाइल शराब पार्टी पर पुलिस रेड की घटना के बाद पूरे गुजरात की पॉलिटिक्स और सोशल ताने-बाने में भूचाल आ गया है। इस रेड ने राज्य में कागज़ों पर चल रहे शराब बैन के दावों की हवा निकाल दी है। घटना के बाद आम जनता से लेकर सोशल मीडिया तक हर जगह एक ही सवाल गूंज रहा है – “राजकोट में शराब पार्टी पर रेड और अब आगे क्या…???”

इस चैप्टर के सामने आने के बाद पूरे राज्य से जो रिएक्शन और लोगों में गुस्सा सामने आ रहा है, उसने एडमिनिस्ट्रेशन और सरकार की पॉलिसी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनता और अलग-अलग तबकों से उठ रही आवाज़ों को देखते हुए, गुजरात के सिक्योरिटी सिस्टम पर एक काला धब्बा लग गया है।

जनता और विपक्षी पार्टियों के तीखे सवाल और रिएक्शन:

  1. बैन पूरी तरह हटाओ:

गुजरात में कागज़ पर ड्राई स्टेट (बैन) के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। जब हर घर, फार्महाउस और होटल में बेलगाम शराब की नदियां बह रही हैं, तो ईमानदार नागरिकों का एक ही सवाल है कि जब कानून सख्ती से लागू नहीं हो रहा है, तो यह दिखावटी बैन पूरी तरह क्यों नहीं हटाया जा रहा और ढील क्यों दी जा रही है?

  1. जांच के नाम पर ‘एक्सटॉर्शन’ बंद करो:

आरोप लग रहे हैं कि पुलिस या जांच एजेंसियों द्वारा पकड़े गए बड़े मामलों में असली मास्टरमाइंड तक पहुंचने के बजाय, सिर्फ कागज़ों पर बहीखाता रखकर ‘सेटिंग’ के नाम पर किश्तों और वसूली का खेल खेला जा रहा है। जांच के नाम पर ये भ्रष्ट एक्सटॉर्शन अब बंद होने चाहिए। 3. सभी आरोपियों की पब्लिक में परेड करवाएं:

जब आम क्रिमिनल या आम शराब तस्कर पकड़े जाते हैं, तो पुलिस तुरंत उनकी परेड करवाने में बहुत जोश दिखाती है, लेकिन जब हाई-प्रोफाइल या राजनीतिक रूप से असरदार अमीर लोगों के बेटे शराब पार्टी में पकड़े जाते हैं, तो पुलिस नरम क्यों पड़ जाती है? कानून का डर पैदा करने के लिए सभी हाई-प्रोफाइल आरोपियों की पब्लिक में परेड क्यों नहीं करवाई जाती?

  1. बहन-बेटियों को इस तरह बदनाम न करें:

शराब पार्टी पर रेड के बाद, उसमें मौजूद लड़कियों और महिलाओं की पहचान कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और कई मीडिया आउटलेट्स पर सामने आई है, जिससे समाज में भारी गुस्सा है। कानूनी जांच हो रही है, लेकिन किसी भी महिला या बेटी की प्राइवेसी और इज्ज़त से समझौता करके उसे बदनाम करने का हक किसी को नहीं है।

  1. बड़े पुलिस अधिकारियों के बीच ‘सेटिंग’:

राजकोट में हुई इस हाई-प्रोफाइल घटना के पीछे लोकल पुलिस स्टेशन और बड़े अधिकारियों के बीच अंदरूनी झगड़े और ‘मलाइदार वेटिंग’ या ‘सेटिंग’ के समीकरण काम करने की ज़ोरदार चर्चाएं हैं। यह पता लगाने के लिए कि किस अधिकारी ने किसे बचाने के लिए फाइलें दबाईं, न्यायिक जांच ज़रूरी हो गई है।

  1. क्या यह रेड ज़मीन के झगड़े या ज़बरदस्ती वसूली में की गई थी?:

इस पार्टी रेड के बारे में एक नया खुलासा हो रहा है कि यह कोई रेगुलर शराब विरोधी ड्राइव नहीं थी, बल्कि पूरी रेड जानबूझकर दो ग्रुप के बीच दुश्मनी, ज़मीन के झगड़े या पैसे के लेन-देन और ज़बरदस्ती वसूली के खेल की जानकारी फैलाकर की गई थी। अगर यह सच है, तो यह सबसे डरावना संकेत है कि पुलिस सिस्टम का गलत इस्तेमाल निजी फ़ायदों के लिए किया जा रहा है।

  1. गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी को इस्तीफ़ा देना चाहिए:

गुजरात में सख़्त कानूनी सिस्टम और शराब तस्करों पर नकेल कसने के बड़े-बड़े दावे खोखले साबित होने के बाद, विपक्षी नेता और जनता अब सीधे तौर पर यह मांग उठा रहे हैं कि अगर पुलिस सिस्टम पर कोई पॉलिटिकल कंट्रोल नहीं है और हाई-प्रोफाइल पार्टियां खुलेआम हंगामा कर रही हैं, तो गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी को नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।

नतीजा: क्या कानून सिर्फ़ कागज़ों पर और गरीबों के लिए है? इस सारी स्थिति और जनता के रिएक्शन से यह साफ़ हो जाता है कि गुजरात में शराबबंदी कानून आज सिर्फ़ गरीब मज़दूरों और छोटे तस्करों तक ही सीमित होता जा रहा है, जबकि पैसे और पहुँच वाले हाई-प्रोफ़ाइल लोगों के लिए यह कानून सिर्फ़ एक मज़ाक बन गया है।

राजकोट की इस घटना ने साबित कर दिया है कि सिस्टम में कहीं न कहीं बड़ी सड़ांध है। अब देखना यह है कि सरकार इस मामले में कोई सख़्त और मिसाल देने वाले कदम उठाती है या यह मामला भी कागज़ों पर बने कानून की तरह धूल फांकता रहेगा!

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