एम.एस. विश्वविद्यालय के पास खुलेआम डाला जा रहा निर्माण कचरा, बारिश के पानी की निकासी और पर्यावरण पर मंडराया खतरा; विश्वामित्री नदी के किनारों पर भी मलबा डालने के आरोप
वडोदरा। गुजरात की सांस्कृतिक नगरी वडोदरा में पर्यावरण संरक्षण और जलस्रोतों की सफाई को लेकर किए जा रहे दावों के बीच प्राकृतिक जलमार्गों की स्थिति पर सवाल खड़े हो रहे हैं। प्रतिष्ठित एम.एस. विश्वविद्यालय के पास से गुजरने वाले ऐतिहासिक भूखी कांस नाले में निर्माण और तोड़फोड़ से निकलने वाला मलबा डाले जाने का मामला सामने आया है। स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार, नाले के आसपास लगातार निर्माण सामग्री, प्लास्टिक और अन्य ठोस कचरा फेंका जा रहा है। इससे प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
भूखी कांस केवल एक सामान्य नाला नहीं, बल्कि मानसून के दौरान शहर के बड़े हिस्से से बारिश के पानी की निकासी का महत्वपूर्ण प्राकृतिक माध्यम माना जाता है। इसके किनारों और जलप्रवाह के रास्ते में मलबे के ढेर जमा होने से पानी की आवाजाही बाधित हो सकती है। स्थानीय लोगों की चिंता है कि यदि समय रहते इस कचरे को नहीं हटाया गया, तो बारिश के दौरान आसपास के क्षेत्रों में जलभराव की समस्या गंभीर रूप ले सकती है। इसके साथ ही जमा गंदगी से दुर्गंध फैलने, मच्छरों की संख्या बढ़ने और मौसमी बीमारियों का खतरा भी पैदा हो सकता है।
आरोप है कि कुछ निर्माणकर्ताओं और अन्य लोगों की ओर से दिन-रात नाले के आसपास मलबा डाला जा रहा है। सवाल यह है कि शहर के प्रमुख शैक्षणिक संस्थान के नजदीक इस तरह की गतिविधियां लंबे समय तक कैसे जारी रह सकती हैं। नगर निगम की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। नागरिकों का कहना है कि प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों को कचरा डालकर अवरुद्ध करना शहर के पर्यावरण और भविष्य की सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
वहीं, वडोदरा की जीवनरेखा मानी जाने वाली विश्वामित्री नदी के किनारों पर भी मलबा डाले जाने की शिकायतें सामने आई हैं। आरोप है कि नदी के तल और आसपास के क्षेत्रों में निर्माण कचरा जमा होने से उसके प्राकृतिक बहाव पर असर पड़ सकता है। इस स्थिति को लेकर पर्यावरण से जुड़े लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विद्यार्थियों में चिंता जताई जा रही है। उनका कहना है कि नदी और प्राकृतिक जलमार्गों की क्षमता प्रभावित होने का सीधा असर मानसून के दौरान शहर की जल निकासी व्यवस्था पर पड़ सकता है।
इस पूरे मामले में कई सवाल नगर निगम की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे हैं। एम.एस. विश्वविद्यालय जैसे प्रमुख क्षेत्र के पास इतनी बड़ी मात्रा में मलबा किसकी अनुमति से डाला जा रहा है? क्या नगर निगम के संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं है? यदि जानकारी है तो अब तक मलबा डालने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई? प्राकृतिक जलस्रोतों और नदी के किनारों को नुकसान पहुंचाने वालों की जिम्मेदारी तय करने की मांग भी उठ रही है।
पर्यावरणविदों और नागरिकों ने मांग की है कि भूखी कांस नाले तथा विश्वामित्री नदी के आसपास जमा निर्माण मलबे को तत्काल हटाया जाए। साथ ही, मलबा डालने के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए। नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि नगर निगम ने जल्द कदम नहीं उठाए तो इस मुद्दे पर जन आंदोलन शुरू किया जाएगा। अब देखना यह होगा कि प्रशासन प्राकृतिक जलमार्गों की सुरक्षा और शहर की जल निकासी व्यवस्था को लेकर कब ठोस कार्रवाई करता है।

