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हमें “चाह” होती है इसलिए हम ‎ दुखी होते हैं- श्रेयांशप्रभ जी : ‎जैन बगीचे में चातुर्मासिक प्रवचन

‎‎हेमंत वर्मा संवाददाता राजनांदगांव : ‎राजनांदगांव ” हमारे जीवन में दुख इसलिए होता है कि हमें चाह होती है। यदि चाह ना हो तो फिर दुख किस बात का। हमारी इच्छाएं अनंत है और हम परमात्मा की भक्ति छोड़ अपनी इच्छाओं की पूर्ति में ही लगे रहते हैं! परमात्मा के पास रहने से हमें वह मिल सकता है जो हमें इच्छाओं की पूर्ति में लगे रहने से कभी नहीं मिल सकता।” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने आज जैन बगीचा स्थित नये हाल में संवत्सरी पर्व के चौथे दिन अपने नियमित प्रवचन में व्यक्त किए।

मुनि श्री श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि व्यक्ति यदि क्रोध में रहता है तो वह किसी की नहीं सुनता। क्रोध व्यक्ति को अंधा और बहरा बना देता है। क्रोधी व्यक्ति के सोचने समझने की शक्ति खत्म हो जाती है। परमात्मा के पास बैठने से शांति मिलती है। हम यदि अच्छे भाव से परमात्मा के पास जाते हैं तो हम मोक्ष भी प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि हम धर्म की बात रोज सुनते हैं किंतु उसे आचरण में नहीं ला पाते,यदि हम एक भी अंश आचरण में ला लें तो हमारा जीवन धन्य हो जाएगा।

मुनि श्री श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि आप कितना भी पुरुषार्थ कर लो किंतु जो चीज आपको चाहिए,यदि उसका समय नहीं हुआ है तो आपको वह चीज नहीं मिल पाएगी । समय बलवान होता है। जो आपका कर्तव्य है,आप उसका पालन करें। यदि हम सारी ऊर्जा भी खर्च कर दे तो परमात्मा के देव स्वरूप को हम नहीं देख पाएंगे। परमात्मा का बच्चे जैसा ख्याल रखना पड़ता है तब कहीं जाकर परमात्मा को स्पर्श करने का सौभाग्य मिलता है। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।

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