आज के समय में मंदिरों के बाहर कई किलोमीटर लंबी कतारें देखने को मिलती हैं। उस भीड़ के बीच इंसान अधीर होकर VIP पास या जान-पहचान की ‘सिफ़ारिश’ (लागवग) तलाशता रहता है, ताकि कतार तोड़कर जल्दी आगे निकल सके। पैसे और रुतबे से मिला यह शॉर्टकट शरीर को कुछ पलों के लिए गर्भगृह के करीब ज़रूर ले जाता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे ईश्वर के साथ की दूरी सच में कम होती है?
परमात्मा किसी धनवान या विशेषाधिकार वाले व्यक्ति के मोहताज नहीं हैं। ईश्वर के दरबार में जेब का वज़न या सिफ़ारिश नहीं, बल्कि हृदय की ‘सच्ची भावना’ और शुद्ध भाव देखा जाता है। अगर ईश्वर तक पहुँचने की कतार सच में छोटी करनी है, तो उसका एकमात्र मार्ग है: पीड़ित, भूखे और ज़रूरतमंद की निःस्वार्थ सेवा और सत्कर्म।
“वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पराई जाणे रे…” — नरसिंह मेहता
एक संत भगवान के लिए भोग की थाली लेकर मंदिर जा रहे थे। रास्ते में एक असहाय वृद्ध भूख और प्यास से तड़प रहा था। संत ने बिना एक पल गंवाए थाली में रखे फल और जल उस वृद्ध को प्रेमपूर्वक खिला-पिला दिए।
जब वे खाली हाथ मंदिर पहुँचे, तो पुजारी ने पूछा, “महाराज, भगवान के लिए भोग कहाँ है?” संत ने मुस्कुराकर बेहद सुंदर उत्तर दिया: “मैं मंदिर पहुँचता, उससे
पहले ही भगवान रास्ते में भूखे बनकर मिल गए थे, और मैंने उन्हें तृप्त कर दिया!”
यही सनातन सत्य है। जब हम किसी बेसहारा को सहारा, भूखे को अन्न या निराश व्यक्ति को हिम्मत देते हैं, तो वह सीधा परमात्मा का ही सत्कार बनता है।
सेवा और भावना से ईश्वर तक की दूरी कैसे तुरंत मिट जाती है?
अहंकार का विसर्जन: VIP कतार में चलने वाले के मन में ‘मैं खास हूँ’ का सूक्ष्म अहंकार जन्म लेता है, जबकि सेवा का मार्ग अहंकार को पिघलाकर विनम्रता सिखाता है। जहाँ अहंकार शून्य होता है, वहीं प्रभु का सच्चा वास होता है।
नर सेवा ही नारायण सेवा: स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि हर जीव में शिव का वास है। पत्थर की मूर्ति में आस्था रखना उत्तम है, लेकिन जीते-जागते इंसान के आँसू पोंछना साक्षात प्रभु की पूजा है।
कर्म का प्रभाव: दूसरों के जीवन से अंधकार मिटाने के लिए जब आप एक छोटा-सा दीपक जलाते हैं, तो उसका पहला प्रकाश आपके अपने अंतःकरण को रोशन कर देता है।
जो हाथ सिर्फ प्रार्थना के लिए जुड़ते हैं, उनकी तुलना में जो हाथ किसी असहाय को सहारा देने के लिए आगे बढ़ते हैं, वे प्रभु को हज़ार गुना अधिक प्रिय होते हैं।
बाहरी आडंबर, दिखावा और पहचान की सिफ़ारिश सिर्फ आँखों को संतोष दे सकती है, आत्मा को नहीं। अगर ईश्वर के सबसे करीब बैठना है, तो मंदिर की कतार तोड़ने या सिफ़ारिश लगाने की ज़रूरत नहीं है; बस सच्ची भावना से किसी के आँसू पोंछकर उसके दिल में जगह बना लीजिए—परमात्मा वहीं आपके सामने साक्षात खड़े होंगे।
दर्शना पटेल (नेशनल मेडलिस्ट) स्पोर्ट्स टीचर

