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IKDRC में 83 करोड़ के घोटाले के आरोपों पर किरण पारिख का पलटवार: “बड़े मगरमच्छों को बचाने के लिए छोटे कर्मचारियों की दी जा रही बलि”

कांग्रेस-भाजपा की कथित ‘सांठगांठ’ और PMO फंड में 40% कमीशन के गंभीर आरोपों से गुजरात के राजनीतिक और स्वास्थ्य हलकों में मचा हड़कंप; कैग (CAG) रिपोर्ट के बाद निष्पक्ष जांच की मांग तेज।

अहमदाबाद। इंस्टीट्यूट ऑफ किडनी डिसीज एंड रिसर्च सेंटर (IKDRC) यानी अहमदाबाद की प्रसिद्ध किडनी अस्पताल में कथित 83 करोड़ रुपये के डायलिसिस उपकरणों के घोटाले के आरोपों ने पूरे राज्य की राजनीति को गरमा दिया है। कांग्रेस प्रवक्ता पार्थिवराज सिंह द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों के जवाब में किरण पारिख ने सामने आकर अपनी चुप्पी तोड़ी है और सभी आरोपों को पूरी तरह से मनगढ़ंत और बेबुनियाद करार दिया है।

बायोट्रस्ट और पत्नी की कंपनी पर किरण पारिख की सफाई

अपने और अपने परिवार की कंपनी पर लगे आरोपों को खारिज करते हुए किरण पारिख ने कहा, “बायोट्रस्ट कंपनी साल 2013 से इस क्षेत्र में पूरी पारदर्शिता के साथ काम कर रही है। हमारी कंपनी हमेशा मेरिट (योग्यता) के आधार पर ही आगे आती है और कभी किसी डायरेक्ट टेंडर में हिस्सा नहीं लेती। टेंडर को मंजूरी देना टेंडर कमेटी का काम है, और मैं खुद इस कमेटी का सदस्य नहीं हूँ। आज तक बायोट्रस्ट या मुझे प्रबंधन की ओर से कोई भी कारण बताओ नोटिस, चेतावनी या आपत्ति पत्र नहीं मिला है।”

उन्होंने आगे कहा, “मेरी पत्नी को पूरे देश में स्वतंत्र रूप से व्यापार करने का संवैधानिक अधिकार है। देशभर में 83 करोड़ रुपये के डायलिसिस उपकरणों की बिक्री नियमों और मेरिट के आधार पर ही की गई है। अतीत में भी ऐसी शिकायतें दर्ज कराई गई थीं, जिसके बाद IKDRC द्वारा सरकार को रिपोर्ट भेजी गई थी और स्वास्थ्य सचिव स्तर से मेरी पत्नी की कंपनी को पूरी तरह ‘क्लीन चिट’ दी जा चुकी है।”

“मूल भ्रष्टाचार से ध्यान भटकाने की साजिश”

किरण पारिख ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अस्पताल में चल रही अन्य अनियमितताओं और बड़े घोटालों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए छोटे और अनुबंध (कंट्रैक्ट) पर काम करने वाले कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। जिन कर्मचारियों के पास कोई प्रशासनिक अधिकार ही नहीं हैं, वे करोड़ों रुपये के डायलिसिस मशीन खरीदने का ऑर्डर कैसे दे सकते हैं?

उन्होंने याद दिलाया कि अतीत में डायलिसिस सेंटर के लिए खरीदी गई मशीनों में हुई धांधली का खुलासा कैग (CAG) की रिपोर्ट में भी हुआ था। वह खरीदारी तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य सचिव की मंजूरी से ही की गई थी। इसके बावजूद बड़े अधिकारियों को बचा लिया गया और बेकसूर छोटे कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया गया।

राजनीतिक सांठगांठ और 40% कमीशन के आरोप से सनसनी

इस पूरे मामले में एक नया मोड़ लाते हुए किरण पारिख ने दावा किया, “किडनी अस्पताल के असली घोटालों पर पर्दा डालने के लिए कांग्रेस और भाजपा की अंदरूनी ‘सांठगांठ’ हो चुकी है।”

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, अस्पताल में करोड़ों रुपये का भ्रष्टाचार फल-फूल रहा है। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री फंड से भी 40% तक का कमीशन लिए जाने के सनसनीखेज आरोप सामने आए हैं, जिससे गांधीनगर के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भ्रष्टाचार मुक्त शासन के सपने को ऐसे भ्रष्ट अधिकारी धूमिल कर रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या PMO (प्रधानमंत्री कार्यालय) इस पूरे प्रकरण पर संज्ञान लेते हुए निष्पक्ष जांच के आदेश देगा? राज्य सरकार इस बहुचर्चित 83 करोड़ के मामले और गांधीनगर तक फैले भ्रष्टाचार के तारों पर क्या कदम उठाती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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