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GSRTC वोल्वो बसों के नाम पर बड़ा स्कैम? सरकारी लोगो, प्राइवेट एडमिनिस्ट्रेशन और जनता की लूट के सनसनीखेज आरोप

स्पेशल रिपोर्ट, अहमदाबाद : गुजरात स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (GSRTC), जिसे आम जनता की लाइफलाइन माना जाता है, के एक पैसेंजर ने ST कॉर्पोरेशन की वोल्वो और AC बसों के मैनेजमेंट पर बहुत गंभीर सवाल उठाए हैं। एक जागरूक नागरिक ने सरकारी लोगो के पीछे चल रहे प्राइवेट खेल और जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी को लेकर अपना कड़वा अनुभव सोशल मीडिया पर शेयर किया है, जो अब चर्चा का विषय बन गया है।

धनेरा-पालनपुर का सफर और खुला ‘राज’

एक पैसेंजर दो दिन पहले GSRTC की AC डीलक्स वोल्वो बस में धनेरा से पालनपुर के लिए चढ़ा था। 118 रुपये किराया देने के बाद जब उसने कंडक्टर से रेगुलर अप-डाउन करने वाले पैसेंजर के लिए पास की सुविधा के बारे में पूछा, तो चौंकाने वाली बातें सामने आईं। कंडक्टर ने कहा कि इन बसों में कोई पास की सुविधा नहीं है।

प्रति किलोमीटर पेमेंट: प्राइवेट सेक्टर को फायदा, कॉर्पोरेशन को नुकसान?

पैसेंजर के आरोप के मुताबिक, ये बसें भले ही GSRTC के नाम पर चलती हैं, लेकिन इनका असली मैनेजमेंट प्राइवेट ऑपरेटर करते हैं।
किलोमीटर का खेल: कॉर्पोरेशन इन प्राइवेट ऑपरेटर को हर किलोमीटर के हिसाब से एक तय रकम देता है। बस को पैसेंजर मिले या न मिले, प्राइवेट ऑपरेटर की कमाई तय रहती है!

सैलरी में अंतर: ड्राइवर की सैलरी प्राइवेट ऑपरेटर देता है, जबकि टिकट से होने वाली कमाई कॉर्पोरेशन को जाती है, इसलिए कंडक्टर की सैलरी कॉर्पोरेशन (यानी सरकार) को देनी पड़ती है।

सवाल यह उठता है कि अगर बस खाली भी चलती है, तो भी प्राइवेट मालिकों को काफी पैसा मिलता है, तो यह नुकसान किसका है? सीधे कॉर्पोरेशन का और इनडायरेक्टली जनता का!

जांच का विषय: ये प्राइवेट ऑपरेटर कौन हैं? इस पूरे सिस्टम पर सवाल उठाते हुए नागरिक ने लिखा, “अगर हम थोड़ी बिज़नेस सेंस का इस्तेमाल करें तो समझ जाएंगे कि इससे सिर्फ़ प्राइवेट ऑपरेटरों को फ़ायदा होता है। अब जांच का विषय यह है कि जिन प्राइवेट कंपनियों और बसों ने GSRTC के साथ ऐसे एग्रीमेंट किए हैं, उनके मालिक कौन हैं? क्या वे सरकार के करीबी हैं या सत्ता में बैठे नेताओं के पार्टनर हैं?”

धर्म के नाम पर जनता कब तक अनजान रहेगी?

आखिर में यात्री ने बड़े गुस्से में कहा कि आम जनता को इमोशनल मुद्दों और धर्म के नाम पर उलझाकर बेसिक सुविधाओं में भारी फाइनेंशियल एडमिनिस्ट्रेशन किया जा रहा है। जब तक जनता जागरूक नहीं होगी और ऐसे सरकारी और प्राइवेट गठजोड़ के खिलाफ़ सवाल नहीं पूछेगी, तब तक इस तरह की फाइनेंशियल लूट जारी रहेगी।

क्या GSRTC की यह ‘किलोमीटर स्कीम’ सच में जनता के फ़ायदे के लिए है या नेताओं-ठेकेदारों की जेब भरने के लिए? यह अब एक बड़ा सवाल है।

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