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मोरबी आंदोलन के मंच से हकाभा गढ़वी ने हाथ जोड़कर सरकार से की रिक्वेस्ट

‘किसानों की मांगें पूरी करो, अब पूरी होने को तैयार हैं, हर किसान पर लाखों का कर्ज है!’

मोरबी। मोरबी के जेतपार गांव में एक प्राइवेट बिजली कंपनी की तर्ज पर चल रहा किसानों का आंदोलन अब एक तीखा और नेशनल लेवल पर बहस का टॉपिक बनता जा रहा है। अपनी उपजाऊ ज़मीन और हक बचाने के लिए दिन-रात लड़ रहे अन्नदाता के सपोर्ट में अब गुजरात के लोक लेखक और कलाकार भी मैदान में उतर आए हैं। जेतपार गांव में चल रहे आंदोलन के दौरान किसानों का हौसला बढ़ाने के लिए एक लोक नृत्य का आयोजन किया गया। इस नृत्य के मंच से मशहूर कॉमेडियन और लोक लेखक हकाभा गढ़वी ने हाथ जोड़कर सरकार से जो रिक्वेस्ट की, उसमें किसानों की पीड़ा को बयां किया, उसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

किसान कर्ज के पहाड़ तले दबे हैं, उनकी मजबूरी समझो!

मंच से माइक संभालते ही हकाभा गढ़वी बहुत इमोशनल हो गए और सरकार का मज़ाक उड़ाते हुए कहा, “मैं सरकार से हाथ जोड़कर रिक्वेस्ट करता हूं कि इस देश के किसानों की मांगें जल्द से जल्द पूरी करें। अब किसान पूरी होने के लिए तैयार हैं!” उन्होंने मौजूदा हालात की एक तस्वीर पेश करते हुए कहा कि आज गांव का हर किसान कर्ज के पहाड़ तले दबा हुआ है। हर किसान पर पांच लाख रुपये का कर्ज है। ऐसे मुश्किल हालात में अगर उनकी उपजाऊ जमीन भी छीन ली गई या खत्म कर दी गई, तो दुनिया की दौलत कहां जाएगी?

प्राइवेट कंपनियां क्यों फायदा उठाएं और किसान क्यों परेशान हों?

मोरबी के जेतपार और आस-पास के इलाकों से गुजर रही हाई-टेंशन बिजली लाइनों की वजह से हजारों बीघा जमीन खतरे में है। कलाकारों और स्थानीय नेताओं का आरोप है कि सरकार जानबूझकर बड़े उद्योगपतियों और प्राइवेट बिजली कंपनियों के फायदे के लिए किसानों के हितों की बलि दे रही है। दियारा के मंच से गाए गए वीरतापूर्ण गीत और हकाभा की इस मार्मिक अपील ने आंदोलन कर रहे किसानों की आंखों में आंसू ला दिए। क्या कलाकारों की धुनों के बाद अब बहरी सरकार जागेगी? किसानों के हक की यह लड़ाई अब सिर्फ जमीन की लड़ाई नहीं रही, बल्कि पहचान और वजूद की लड़ाई बन गई है। जब राज्य का एक पॉपुलर कलाकार मंच से हंसी परोसने के बजाय किसानों के लिए इंसाफ की भीख मांग रहा हो, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि हालात कितने गंभीर होंगे। अब देखना यह है कि लोकगीतकार हकभा गढ़वी की हाथ जोड़कर की गई यह गुहार गांधीनगर के AC बंगलों में बैठे हुक्मरानों के कानों तक पहुंचती है या नहीं? या यह अन्नदाता ऐसे ही सड़क पर बैठने को मजबूर होगा।

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