बारिश ने खोली सिस्टम की परतें, जनता पूछ रही—आखिर जिम्मेदार कौन?
मुद्दनी वात, ग्रुप एडिटर पवन माकन के साथ
अहमदाबाद। मानसून की पहली तेज बारिश ने एक बार फिर प्रशासन के दावों, प्री-मानसून तैयारियों और स्मार्ट सिटी मॉडल की असलियत को सड़कों पर लाकर खड़ा कर दिया है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद शहर के कई हिस्से पानी में डूब गए, सड़कें तालाब बन गईं और आम नागरिक घंटों ट्रैफिक जाम में फंसे रहे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि हर वर्ष यही स्थिति बनती है तो आखिर प्रशासन पूरे साल करता क्या है?
करोड़ों का बजट, फिर भी हर साल वही हाल
हर मानसून से पहले नगर निगम और प्रशासन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा करते हैं कि ड्रेनेज लाइनें साफ कर दी गई हैं, जलभराव वाले क्षेत्रों की पहचान कर ली गई है, पंपिंग स्टेशन तैयार हैं और आपदा प्रबंधन की पूरी व्यवस्था कर ली गई है। लेकिन जैसे ही पहली बारिश होती है, शहर की तस्वीर इन दावों का मजाक उड़ाती नजर आती है। यदि प्री-मानसून कार्य वास्तव में हुए थे तो फिर निचले इलाकों में पानी क्यों भर गया? यदि ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त था तो सड़कों पर नदियां क्यों बहने लगीं? यदि प्रशासन तैयार था तो नागरिकों को घंटों परेशानी क्यों झेलनी पड़ी?
क्या सिर्फ फाइलों में ही साफ हुई नालियां?
जनता के बीच सबसे बड़ी चर्चा यही है कि आखिर प्री-मानसून कार्य जमीन पर हुए भी थे या केवल कागजों में पूरे दिखा दिए गए? हर वर्ष करोड़ों रुपये की सफाई, ड्रेनेज सुधार और जल निकासी योजनाओं पर खर्च दिखाया जाता है, लेकिन नतीजे शून्य क्यों हैं?
क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है? क्या यह ठेकेदारों और अधिकारियों की मिलीभगत का परिणाम है? या फिर जनता के टैक्स के पैसों का खुला दुरुपयोग?
वर्षों से सत्ता में बैठे लोग जवाब दें
सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी वर्षों से शहर चला रहे हैं। ऐसे में यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उन्हें शहर के जलभराव वाले क्षेत्रों की जानकारी नहीं है। यदि समस्या पुरानी है तो उसका स्थायी समाधान क्यों नहीं हुआ? यदि समाधान हो चुका है तो फिर हर बारिश में शहर क्यों डूब जाता है? जनता पूछ रही है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
क्या किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार है?
इतिहास गवाह है कि जलभराव केवल असुविधा नहीं पैदा करता बल्कि कई बार जानलेवा भी साबित होता है। खुले मैनहोल, करंट लगने की घटनाएं, सड़क दुर्घटनाएं और जलजनित बीमारियां हर साल सामने आती हैं। क्या प्रशासन किसी बड़ी त्रासदी के बाद ही जागेगा? क्या किसी नागरिक की जान जाने के बाद जवाबदेही तय होगी? या फिर इस बार भी जांच, समीक्षा और बैठकों का वही पुराना खेल चलेगा?
जनता को भाषण नहीं, समाधान चाहिए
स्मार्ट सिटी के बड़े-बड़े होर्डिंग लगाने से शहर स्मार्ट नहीं बनता। स्मार्ट सिटी वह होती है जहां बारिश के बाद लोग घरों में कैद न हों, जहां सड़कें झील में न बदलें और जहां प्रशासन संकट आने से पहले तैयारी करे। जनता अब आश्वासनों से ऊब चुकी है। उसे प्रेस नोट नहीं, परिणाम चाहिए। उसे दावे नहीं, जवाब चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण—उसे यह जानने का अधिकार है कि हर साल खर्च होने वाले करोड़ों रुपये आखिर जा कहां रहे हैं?

