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उत्तर प्रदेश के गाँवों की गूँज: प्रगति का पथ और परिवर्तन का प्रकाश

डॉ. शैलेश शुक्ला

उत्तर प्रदेश की आत्मा इसके गांवों में बसती है और पिछले नौ वर्षों का कालखंड इस सत्य का साक्षी रहा है कि जब नीतिगत स्पष्टता और धरातलीय क्रियान्वयन का संगम होता है, तो दशकों की जड़ता भी गतिशीलता में बदल जाती है। 2017 से 2026 के मध्य उत्तर प्रदेश ने ‘बीमारू’ राज्य की छवि को पीछे छोड़ते हुए ग्रामीण विकास के उन प्रतिमानों को स्थापित किया है, जिन्हें आज नीति आयोग के ‘डेल्टा रैंकिंग’ और ‘बहुआयामी गरीबी सूचकांक’ (MPI) में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की रिपोर्टों के साथ समन्वय करते हुए भारत के गरीबी सूचकांक बताते हैं कि उत्तर प्रदेश ने करोड़ों लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला है, जिसका सर्वाधिक लाभ ग्रामीण अंचलों को मिला है। यह परिवर्तन केवल सांख्यिकीय सुधार नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन के हर आयाम—चाहे वह बिजली हो, सड़क हो, स्वास्थ्य हो या सुरक्षा—में आया एक बुनियादी बदलाव है।

ग्रामीण उत्थान की इस गाथा का सबसे दृश्य स्तंभ बुनियादी ढांचे का सुदृढ़ीकरण है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तीसरे चरण के सफल क्रियान्वयन के साथ उत्तर प्रदेश ने अपने ग्रामीण पथों को एक नई पहचान दी है। पिछले नौ वर्षों में राज्य ने लगभग 32,000 किलोमीटर से अधिक ग्रामीण सड़कों का सुदृढ़ीकरण और चौड़ीकरण सुनिश्चित किया है। इन सड़कों ने न केवल कृषि उत्पादों के लिए ‘फार्म-टू-मार्केट’ पहुंच को सुगम बनाया, बल्कि ग्रामीण युवाओं के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने की बाधाओं को भी समाप्त किया है। अब ग्रामीण क्षेत्रों में मंडी परिषद् और लोक निर्माण विभाग द्वारा निर्मित सड़कों का जाल सुदूरवर्ती मजरों को जिला मुख्यालयों से जोड़ रहा है। परिवहन की इस सुगमता ने रसद (Logistics) लागत को कम किया है, जिससे छोटे किसानों की शुद्ध आय में वृद्धि दर्ज की गई है।

ऊर्जा के क्षेत्र में ‘सौभाग्य योजना’ और ‘दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना’ ने उत्तर प्रदेश के ग्रामीण परिदृश्य का अंधेरा छटा दिया है। राज्य सरकार के ऊर्जा सुधारों के फलस्वरूप आज गांवों को रोस्टर के अनुसार 18 घंटे की निर्बाध बिजली आपूर्ति मिल रही है। यह आंकड़ा पूर्ववर्ती वर्षों की तुलना में लगभग दोगुना है। बिजली की इस उपलब्धता ने केवल प्रकाश ही नहीं फैलाया, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विविधीकरण का मार्ग प्रशस्त किया है। अब गांवों में आटा चक्की, वेल्डिंग यूनिट और लघु प्रसंस्करण इकाइयां डीजल जनरेटरों के बजाय सस्ती बिजली पर चल रही हैं। इसके अतिरिक्त, ‘कुसुम योजना’ के माध्यम से सोलर पंपों के वितरण ने सिंचाई की लागत को न्यूनतम किया है, जिससे किसान अब पारंपरिक फसलों के स्थान पर नकदी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।

स्वच्छता और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आई क्रांति इस कालखंड की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। ‘स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण)’ के तहत उत्तर प्रदेश ने दो करोड़ से अधिक व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों का निर्माण कर स्वयं को खुले में शौच मुक्त (ODF) घोषित किया और अब ‘ओडीएफ प्लस’ की दिशा में ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन पर कार्य कर रहा है। इन ‘इज्जत घरों’ ने न केवल स्वास्थ्य सुधारों में भूमिका निभाई, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को एक नया आयाम दिया। इसी क्रम में ‘जल जीवन मिशन’ के अंतर्गत ‘हर घर जल’ योजना ने बुंदेलखंड और विंध्य जैसे जल-संकट वाले क्षेत्रों में जीवन को सरल बनाया है। आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में नल कनेक्शन देने की गति देश में सर्वाधिक रही है, जिससे दूषित जल से होने वाली बीमारियों, जैसे जापानी इंसेफेलाइटिस (JE) और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) के मामलों में 95 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है।

आर्थिक सशक्तिकरण के मोर्चे पर, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) ने बिचौलियों की संस्कृति को समाप्त कर दिया है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) के माध्यम से उत्तर प्रदेश के 2.6 करोड़ से अधिक किसानों के खातों में अब तक हजारों करोड़ रुपये की राशि सीधे हस्तांतरित की जा चुकी है। यह राशि बुवाई के समय छोटे किसानों के लिए ऋण के जाल से बचने का सबसे बड़ा सहारा बनी है। साथ ही, ‘एक जनपद एक उत्पाद’ (ODOP) योजना ने ग्रामीण कारीगरों के पारंपरिक हुनर को आधुनिक बाजार की मांग से जोड़ा है। भदोही के कालीन, कन्नौज के इत्र और मुरादाबाद के पीतल उद्योग को मिले सरकारी प्रोत्साहन ने स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित किए हैं, जिससे ग्रामीण युवाओं का बड़े शहरों की ओर होने वाला ‘मजबूरी का पलायन’ अब ‘अवसरों के चुनाव’ में बदल रहा है।

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