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अंधविश्वास के खिलाफ ज़िंदगी भर लड़ाई लड़ने वाले ‘गुजरात विज्ञान जत्था’ के प्रेसिडेंट जयंत पंड्या ने लिया बड़ा फैसला: सालों पुरानी लड़ाई खत्म करने का ऐलान, जानें वजह!

राजकोट/गुजरात, चार दशकों से ज़्यादा समय से गुजरात में साइंस और लॉजिक को बढ़ावा देकर अंधविश्वास, ढोंगी बाबाओं और तांत्रिकों की चालों का पर्दाफाश करने वाले ‘गुजरात विज्ञान जत्था’ के प्रेसिडेंट जयंत पंड्या ने हाल ही में अपनी एक्टिविटीज़ रोकने का एक अचानक और बड़ा फैसला लिया है। जैसे ही यह खबर जंगल में आग की तरह फैली, साइंस पसंद करने वालों और सोशल एक्टिविस्ट्स में बहुत हैरानी और सदमा है।

आइए जानते हैं कि इस ऑर्गनाइज़ेशन ने अब तक गुजरात में किस तरह के कारनामों का पर्दाफाश किया है और यह ऑर्गनाइज़ेशन अब आखिरकार अलविदा क्यों कह रहा है।

‘गुजरात विज्ञान जत्था’ के ज़रिए कौन-कौन सी एक्टिविटीज़ की गईं?

जयंत पंड्या और उनके संगठन ‘विज्ञान जत्था’ ने गुजरात के कोने-कोने में जाकर लोगों में साइंटिफिक सोच पैदा करने का ऐसा काम किया है जो पहले कभी नहीं हुआ:
नकली बाबाओं का पर्दाफाश: उन्होंने चमत्कार के नाम पर भोली-भाली जनता को धोखा देने वाले तांत्रिकों, भुवों और कथित संतों का सबके सामने पर्दाफाश किया और उन्हें कानून के सामने खड़ा किया।
चमत्कारों के पीछे का साइंस: हवा से पतंग उड़ाना, नारियल से आग जलाना, या पानी पर दीया जलाना जैसे कथित चमत्कारों के पीछे छिपी केमिस्ट्री और हाथ की सफाई के एक्सपेरिमेंट लोगों को स्टेज पर दिखाए गए।
जन जागरूकता अभियान: अंधविश्वास, जादू-टोना और झूठी मान्यताओं को खत्म करने के लिए ग्रामीण इलाकों में हजारों प्रदर्शनियां और सेमिनार आयोजित किए गए।
अब ये संगठन और गतिविधियां क्यों बंद की जा रही हैं? जयंत पंड्या ने मीडिया के सामने इस फैसले के पीछे के कुछ बहुत गंभीर और ज्वलंत कारण बताए हैं:

  1. सरकार और सिस्टम की बेरुखी: जयंत पंड्या के मुताबिक, जब भी वे किसी पाखंडी तत्व के खिलाफ लड़ते हैं या पुलिस में शिकायत करने जाते हैं, तो उन्हें सिस्टम या सरकार से ज़रूरी मज़बूत सहयोग नहीं मिलता। अंधविश्वास विरोधी कानून लाने के उनके दावे भी बंद कर दिए गए हैं।
  2. बढ़ता खतरा और अकेलापन: पाखंडियों और उनके समर्थकों से बार-बार जान से मारने की धमकियां मिलने के बावजूद, उन्हें पूरी सुरक्षा नहीं मिलती। उन्होंने इस बात का अफसोस जताया है कि ऐसी लड़ाई में सामाजिक संगठन भी अकेले पड़ जाते हैं।
  3. उम्र और सेहत की वजहें: सालों की लगातार भागदौड़ और संघर्ष के बाद, अब उम्र के इस पड़ाव पर सेहत की वजहों से इन कामों को करना मुश्किल हो रहा है।
  4. नई पीढ़ी की हिचकिचाहट: पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी ऐसे जोखिम भरे समाज सुधार के कामों में आगे आने को तैयार नहीं है, जिसकी वजह से इस बड़ी विरासत को संभालने वाला कोई नहीं है। पक्को गुजरात न्यूज़ का लहजा:
    एक ऐसा संगठन जिसने लाखों लोगों को ठगे जाने से बचाया, वह गुजरात छोड़ रहा है। भले ही विज्ञान जत्था ऑफिशियली बंद हो रहा है, लेकिन इसने साइंटिफिक सोच का जो पौधा लगाया है, वह भविष्य में भी लोगों को अंधविश्वास के अंधेरे से बाहर निकालता रहेगा। यह जाना सिस्टम और समाज दोनों के लिए सोचने वाली बात है।
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