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जब सिक्कों की खनक रिश्तों की चीख दबा दे – आज के भौतिकवादी समाज का सबसे क्रूर चेहरा

पवन माकन (ग्रूप एडीटर, धानी मीडिया)

जब रुपया संबंध से ज़्यादा मूल्यवान हो जाए, तब समझ लेना चाहिए कि इंसानियत अपनी अंतिम सांसें गिन रही है। आज के इस आधुनिक, चकाचौंध से भरे और बेहद मतलबी दौर पर चोट करती यह बात कोई साधारण वाक्य नहीं है। यह हमारे आज के समाज का वो कड़वा और नग्न सच है, जिससे हम हर रोज़ गुज़रते हैं। यह एक ऐसा आईना है, जो हमें दिखाता है कि कैसे कागज़ के चंद टुकड़ों के लिए आज का इंसान अपने ही खून के रिश्तों का गला घोंटने से भी नहीं हिचकिचाता।

१. जब तराजू के एक पलड़े पर ‘पैसा’ और दूसरे पर ‘भावना’ हो

एक वो दौर था जब हमारी संस्कृति में रिश्तों को सबसे ऊपर रखा जाता था। पड़ोसी के सुख-दुख में पूरा मोहल्ला जागता था और परिवार में कमाने वाला भले ही एक हो, पूरा घर प्यार और तालमेल से चलता था। लेकिन आज की तस्वीर बिल्कुल उलट है। आज किसी भी नए रिश्ते की शुरुआत ही इस छिपे हुए सवाल से होती है कि “सामने वाले का बैंक बैलेंस कितना है?” या “इससे मुझे क्या फायदा हो सकता है?”

जब रिश्तों की नींव ही नफे-नुकसान, फायदे-घाटे और ब्याज की शर्तों पर रखी जाने लगे, तो वहाँ भावनाओं की कोई जगह नहीं बचती। जिस पल दो इंसानों के बीच ‘पैसा’ सबसे मजबूत कड़ी बन जाता है, ठीक उसी पल बरसों पुराने स्नेह, आदर और भरोसे के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं।

૨. अपनों के बीच व्यापार और अदालतों की चौखट

आज अखबारों के पन्ने और अदालतों के गलियारे ऐसी कहानियों से पटे पड़े हैं, जहाँ सगे भाई ज़मीन के एक टुकड़े के लिए एक-दूसरे की जान के प्यासे बने बैठे हैं। कहीं बेटे अपने बूढ़े माता-पिता की संपत्ति धोखे से अपने नाम करवाकर उन्हें वृद्धाश्रम की राह दिखा रहे हैं, तो कहीं पैसों के लेन-देन में सालों पुरानी दोस्ती दम तोड़ रही है।

यह सब क्या दिखाता है? यह उस पतन की पराकाष्ठा है जहाँ इंसान के लिए रुपया इतना बड़ा हो जाता है कि उसे सामने खड़े अपने ही पिता, भाई या दोस्त की आँखों के आँसू दिखने बंद हो जाते हैं। जब दिल में सिर्फ और सिर्फ लोभ का वास हो जाता है, तब इंसान की संवेदनाएं मर जाती हैं। ऐसा व्यक्ति भले ही करोड़ों के बंगले में रहता हो, लेकिन आत्मा की गहराई में वह सबसे कंगाल होता है।

૩. बंद हुए भावनाओं के कपाट फिर कभी नहीं खुलते

पैसे की एक खूबी है – यह खोकर भी वापस कमाया जा सकता है। आज गया हुआ धन कल दोगुनी रफ्तार से वापस आ सकता है। लेकिन एक बार टूटा हुआ भरोसा और मरी हुई भावनाएं कभी लौटकर वापस नहीं आतीं। जब किसी इंसान को यह अहसास हो जाता है कि उसका इस्तेमाल सिर्फ आर्थिक स्वार्थ के लिए किया गया था, तब उसके भीतर का विश्वास हमेशा के लिए बिखर जाता है। इसके बाद आप चाहे कितनी भी दौलत उसके कदमों में बिछा दें, उसके दिल के बंद हो चुके दरवाज़े फिर कभी नहीं खुल सकते।

आज समाज में अकेलेपन और तनाव के बढ़ने की सबसे बड़ी वजह यही है। हमारे आस-पास भीड़ तो बहुत है, लेकिन उस भीड़ में सच्चे दिल से यह पूछने वाला कोई नहीं है कि “आप कैसे हैं?” सबको बस इसी बात में दिलचस्पी है कि “आपकी हैसियत क्या है?”

अंतिम संदेश और आत्म-चिंतन:

यह लेख केवल पढ़ने के लिए एक विचार नहीं है, बल्कि हर इंसान को रात में सोने से पहले अपने आप से पूछने की ज़रूरत है। पैसा ज़िंदगी जीने का एक साधन हो सकता है, ज़िंदगी का अंतिम मकसद नहीं। आख़िर में श्मशान तक ले जाने के लिए लकड़ियाँ भी इंसान ही देंगे, नोटों की गड्डियाँ नहीं। चलिए, रुपए के पीछे इतनी अंधी दौड़ न लगाएं कि जब हम थककर पीछे मुड़कर देखें, तो हमारे पीछे हमारा अपना कहने वाला कोई खड़ा ही न हो। रिश्तों की इस पवित्रता और गर्माहट को बचाए रखना ही हमारी असल अमीरी है।

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