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LG तरनजीत सिंह संधू का ‘जीरो वेस्ट कॉलोनी’ सुपर मॉडल, दिल्लीवासियों को कूड़े के पहाड़ों से मिलेगी राहत

दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने नवजीवन विहार की जीरो-वेस्ट कॉलोनी का निरीक्षण कर पूरे शहर में इस मॉडल को लागू करने का निर्देश दिया है. इस अनूठे मॉडल से स्थानीय स्तर पर ही कचरे का निपटारा कर गाजीपुर, भलस्वा और ओखला जैसे लैंडफिल साइट्स के कचरे के पहाड़ों को कम किया जाएगा.

दिल्ली की पहचान आज सिर्फ देश की राजधानी के रूप में नहीं, बल्कि कचरे के पहाड़ों वाले शहर के रूप में भी होती जा रही है. गाजीपुर, भलस्वा और ओखला के लैंडफिल साइट्स लगातार बढ़ते कचरे के बोझ से जूझ रहे हैं. ऐसे समय में दक्षिण दिल्ली की एक कॉलोनी- नवजीवन विहार ने एक ऐसा मॉडल पेश किया है, जिसे दिल्ली सरकार और प्रशासन अब पूरे शहर में लागू करने की तैयारी कर रहे हैं.

मंगलवार को दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने नवजीवन विहार का दौरा कर यहां संचालित ‘जीरो-वेस्ट कॉलोनी’ मॉडल का निरीक्षण किया. दौरे के बाद उन्होंने नगर निगम (MCD) को निर्देश दिया कि इस मॉडल को राजधानी के अन्य इलाकों, विशेषकर अनधिकृत और निम्न आय वर्ग की कॉलोनियों में भी लागू करने की दिशा में काम किया जाए.

दिल्ली के लिए क्यों जरूरी है ‘जीरो-वेस्ट’ मॉडल

दिल्ली हर दिन लगभग 11,862 टन ठोस कचरा पैदा करती है. हालांकि, इसका एक बड़ा हिस्सा प्रोसेस किया जाता है, लेकिन हजारों टन कचरा अब भी लैंडफिल साइट्स तक पहुंचता है. नतीजा ये है कि शहर के कूड़े के पहाड़ लगातार ऊंचे होते जा रहे हैं और पर्यावरणीय खतरा बढ़ता जा रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बड़े प्रोसेसिंग प्लांट्स के भरोसे इस समस्या का समाधान संभव नहीं है. कचरे का निपटान उसी स्थान पर करना जहां वह उत्पन्न होता है, अधिक प्रभावी और टिकाऊ समाधान माना जाता है. यही अवधारणा ‘जीरो-वेस्ट कॉलोनी’ मॉडल की आधारशिला है.

नवजीवन विहार के निवासियों ने पेश की मिसाल

दक्षिण दिल्ली की नवजीवन विहार कॉलोनी के निवासी पिछले करीब आठ वर्षों से कचरे के पृथक्करण, कम्पोस्टिंग और रीसाइक्लिंग की व्यवस्था चला रहे हैं. यहां घरों से निकलने वाले गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग एकत्र किया जाता है। जैविक कचरे को कॉलोनी के अंदर ही कम्पोस्टिंग यूनिट में खाद में बदला जाता है, जबकि प्लास्टिक, कागज और अन्य पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को रीसाइक्लिंग चैनल में भेजा जाता है.

अधिकारियों के अनुसार, इस मॉडल के जरिए अब तक 10 लाख किलोग्राम से अधिक कचरे को लैंडफिल साइट्स तक पहुंचने से रोका जा चुका है. कॉलोनी में स्थापित रिड्यूस-रीयूज-रीसायकल (RRR) सेंटर, एरोबिक कम्पोस्टिंग यूनिट और वर्षा जल संचयन प्रणाली इस मॉडल को और मजबूत बनाती हैं.

एलजी का फोकस

दौरे के दौरान एलजी ने स्पष्ट कहा कि स्वच्छ और टिकाऊ कचरा प्रबंधन केवल सरकारी एजेंसियों के भरोसे संभव नहीं है. इसके लिए स्थानीय समुदायों, आरडब्ल्यूए (RWA), नागरिक संगठनों और निजी क्षेत्र को भी साझेदारी निभानी होगी.

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि कम संसाधनों वाली कॉलोनियों में कम्पोस्टिंग यूनिट और RRR सेंटर स्थापित करने के लिए कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंडिंग के विकल्प तलाशे जाएं.

प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, अगले एक वर्ष में राजधानी के विभिन्न हिस्सों में 100 नई ‘जीरो-वेस्ट कॉलोनियां’ विकसित करने की योजना पर काम शुरू किया जा सकता है. इसके लिए उन कॉलोनियों की पहचान की जाएगी, जहां स्थानीय निवासी और आरडब्ल्यूए इस मॉडल को अपनाने के लिए तैयार हों. अनधिकृत कॉलोनियों के लिए बड़ी चुनौती है. हालांकि, इस मॉडल को लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती दिल्ली की अनधिकृत और घनी आबादी वाली कॉलोनियां होंगी, जहां जगह की कमी, जागरूकता का अभाव और संसाधनों की सीमाएं मौजूद हैं.

इसी कारण एलजी ने विशेष रूप से ऐसे इलाकों पर ध्यान केंद्रित करने को कहा है. उनका मानना है कि यदि छोटे स्तर पर सामुदायिक कम्पोस्टिंग और कचरा पृथक्करण की व्यवस्था विकसित हो जाए तो लैंडफिल तक पहुंचने वाले कचरे की मात्रा में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है.

क्या बदल सकती है दिल्ली की तस्वीर?

यदि राजधानी में बड़े पैमाने पर ‘जीरो-वेस्ट कॉलोनी’ मॉडल लागू होता है तो इससे केवल कचरे का बोझ कम नहीं होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर खाद उत्पादन, रीसाइक्लिंग उद्योग को बढ़ावा, स्वच्छता में सुधार और पर्यावरण संरक्षण जैसे कई लाभ मिल सकते हैं.

नवजीवन विहार की सफलता ने ये दिखाया है कि सही योजना, नागरिक भागीदारी और प्रशासनिक समर्थन के साथ दिल्ली अपने कचरा संकट से निपटने की दिशा में एक बड़ा कदम उठा सकती है.

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